भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
दिशामें उड़दसे सुपार्श्व नामक पर्वतकी स्थापना करे। इसे भी सुन्दर वस्त्र और पुष्पोंसे सुसज्जित करे, इसके शिखरपर स्वर्णमय वट-वृक्ष रख दे तथा सुवर्णनिर्मित गौसे सुशोभित कर दे। उसी प्रकार मधुसे बने हुए भद्रसर नामक सरोवर और चमकीली चाँदीसे निर्मित वनसे संयुक्त कर देना चाहिये। तत्पश्चात् पूर्व दिशामें एक हाथ लम्बा-चौड़ा और गहरा कुण्ड बनाकर तिल, घी, समिधा और कुशोद्धार चार श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे हवन कराये। वे सभी ब्राह्मण वेदों और पुराणोंके ज्ञाता, जितेन्द्रिय, अनिन्द्य, चरित्रवान् और सुरूप हों। रातमें मधुर शब्दोंमें गायन और तुरही आदि वाद्योंका वादन कराते हुए जागरण करना चाहिये। इन पर्वतोंका आवाहन इस प्रकार करे—
त्वं सर्वदेवगणधामनिधे च विघ्न- मस्मदगृहेष्खमरपर्वत नाशयाशु।
क्षेमं विधत्स्व कुरु शान्तिमनुत्तमां नः
सम्पूजितः परमभक्तिमतः प्रदेहि ॥
त्वमेव भगवानीशो ब्रह्मा विष्णुर्दिवाकरः।
मूर्तामूर्तपरं बीजमतः पाहि सनातन ॥
यस्मात् त्वं लोकपालानां विश्वमूर्तेश्च मन्दिरम्।
केशवार्कवसूनां च तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे ॥
यस्मादशून्यमपैर्गन्धर्वैश्च शिवेन च।
तस्मान्नामुद्भराशेषदुःखसंसारसागरात् ॥
(उत्तरपर्व १९५। २८—३१)
‘अमरपर्वत! आप समस्त देवगणोंके निवासस्थान और रलोंकी निधि हैं। आप हमारे घरोंमें स्थित विघ्न-बाधाओंको शीघ्र ही नष्ट कर दें, हमारे कल्याणका विधान करें और हमें श्रेष्ठ शान्ति तथा परम भक्ति प्रदान करें। सनातन! आप ही ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, शंकर और सूर्य हैं तथा मूर्त (साकार) और अमूर्त (निराकार)-से परे संसारके बीज (कारणरूप) हैं, अतः
हमारी रक्षा करें। चूँकि आप लोकपालों, विश्वमूर्ति, केशव, सूर्य और वसुओंके निवासस्थान हैं, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करें। चूँकि आप देवताओं, गन्धर्वों और शिवजीसे अशून्य अर्थात् संयुक्त रहते हैं, इसलिये इस निखिल दुःखोंसे भरे हुए संसार-सागरसे मेरा उद्धार करें।’
इस विधिसे उस मेरुगिरिकी अर्चना करनेके पश्चात् मन्दराचलकी पूजा करनी चाहिये और इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—‘मन्दराचल! चूँकि आप चैत्ररथ वन और भद्राश्व वर्षसे सुशोभित हैं, इसलिये शीघ्र ही मेरे लिये तुष्टिकारक बनें।’ ‘गन्धमादन! चूँकि आप जम्बूद्वीपके शिरोमणि हैं, इसलिये गन्धर्वों और अप्सराओंके द्वारा मेरे यशका गान हो।’ ‘विपुल! चूँकि आप केतुमाल वर्ष और वैश्राज वनसे सुशोभित हैं तथा आपका पाषाण स्वर्णमय है, इसलिये आप मुझे शक्ति प्रदान करें।’ ‘सुपार्श्व! चूँकि आप उत्तर कुरुवर्ष और सावित्र वनसे नित्य शोभित हैं, अतः मुझे अक्षय लक्ष्मी प्रदान करें।’ इस प्रकार उन सभी पर्वतोंको आमन्त्रित करके पुनः निर्मल प्रभात होनेपर स्नान आदिसे निवृत्त हो बीचवाला श्रेष्ठ पर्वत गुरु (यज्ञ करानेवाले)-को दान कर दे। इसी प्रकार चारों विष्कम्भपर्वतोंको चारों ऋत्विजोंको क्रमशः दान कर देना चाहिये। इसके बाद चौतीस, दस, सात अथवा आठ गौका दान करनेका विधान है। यदि यजमान निर्धन हो तो वह एक ही दुधारू कपिला गौ गुरुको दान करे। सभी पर्वतदानोंकी यही विधि है। उनके पूजनमें ग्रहों, लोकपालों और ब्रह्मा आदि देवताओंके वे ही मन्त्र हैं और वे ही सामग्रियाँ भी मानी गयी हैं। सभी पर्वत-पूजनोंमें उन-उनके मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये। यजमानको सदा व्रतमें उपवास करना चाहिये। यदि असमर्थ
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- उत्तरपर्व *
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हो तो रातमें एक बार भोजन किया जा सकता है। भारत! अब आप सभी पर्वतदानोंकी विधि, मन्त्र और उनके फल सुनें। दान देते समय धान्यशैलसे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये —
अत्रं ब्रह्म यतः प्रोक्तमन्त्रे प्राणाः प्रतिष्ठिताः। अत्राद् भवन्ति भूतानि जगदन्तरेन वर्धते॥ अत्रमेव यतो लक्ष्मीरत्रमेव जनार्दनः। धान्यपर्वतरूपेण पाहि तस्मान्नगोत्तम॥
(उत्तरपर्व १९५।४३-४४)
‘पर्वतश्रेष्ठ! चूँकि अत्रको ही ब्रह्म कहा जाता है और उसीमें प्राणियोंके प्राण प्रतिष्ठित हैं। अत्रसे
ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, अत्रसे ही संसार संचालित हो रहा है, इसलिये अत्र ही लक्ष्मी है, अत्र ही भगवान् जनार्दन हैं, अतः धान्यशैलके रूपमें आप मेरी रक्षा करें।’
जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे धान्यमय पर्वतका दान करता है, वह सौ मन्वन्तरसे भी अधिक कालतक देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा अप्सराओं और गन्धर्वोंद्वारा व्याप्त सुन्दर विमानसे स्वर्गलोकको जाता है एवं उनके द्वारा पूजित होता है। पुनः पुण्य-क्षय होनेपर वह इस लोकमें निःसंदेह राजाधिराज होता है। (अध्याय १९५)
लवणाचलदान-विधि तथा गुडपर्वतकी महिमाके प्रसंगमें सुलभाका आख्यान
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं श्रेष्ठ लवणाचलके दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिससे मनुष्य शिवलोकको प्राप्त करता है। सोलह द्रोण नमकसे लवणाचल बनाना चाहिये, क्योंकि यही उत्तम है। उसके आधे आठ द्रोणसे मध्यम और चार द्रोणसे बना हुआ लवणाचल अधम माना गया है। निर्धन मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार आधा या एक द्रोणका बनवाना चाहिये। इसके अतिरिक्त (पर्वत-परिमाणके) चौथाई द्रोणसे पृथक्-पृथक् (चार) विष्कम्भ (सहायक)-पर्वतोंका निर्माण कराना चाहिये। ब्रह्मा आदि देवताओंके पूजनका विधान सदा पूर्ववत् होना चाहिये। उसी प्रकार सभी स्वर्णमय वृक्ष एवं लोकपालोंके भी स्थापनका विधान है। पहलेकी तरह इसमें भी कामदेव आदि देवों और सरोवरोंका निर्माण कराना चाहिये तथा रातमें जागरण भी करना चाहिये। अब दान-मन्त्रोंको सुनिये—
सौभाग्यरससम्भूतो यतोऽयं लवणो रसः। दानात्मकत्वेन च मां पाहि पापान्नगोत्तम॥
तस्मादन्नरसाः सर्वे नोत्कृष्टा लवणां विना। प्रियं च शिवयोरित्यं तस्माच्छान्तिप्रदो भव॥ विष्णुदेहसमुद्भूतं यस्मादारोग्यवर्धनम्। तस्मात् पर्वतरूपेण पाहि संसारसागरात्॥
(उत्तरपर्व १९६।६-८)
‘पर्वतश्रेष्ठ! चूँकि यह नमकरूप रस सौभाग्य-सरोवरसे प्रादुर्भूत हुआ है, इसलिये इसके दानसे तुम मेरी रक्षा करो। चूँकि सभी प्रकारके अन्न एवं रस नमकके बिना उत्कृष्ट नहीं होते अर्थात् स्वादिष्ट नहीं लगते तथा तुम शिव और पार्वतीको सदा परम प्रिय हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। चूँकि तुम भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुए हो और आरोग्यकी वृद्धि करनेवाले हो, इसलिये तुम पर्वतरूपसे मेरा संसार-सागरसे उद्धार करो।’ जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे लवणपर्वतका दान करता है, वह एक कल्पतक पार्वतीलोकमें निवास करता है और अन्तमें परमगति—मोक्षको प्राप्त हो जाता है।
भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—महाराज! अब मैं उत्तम गुडपर्वतके दानकी विधि बतला रहा हूँ,
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
जिससे धनी मनुष्य देवपूजित हो स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है। दस भार गुडसे बना हुआ गुडपर्वत उत्तम, पाँच भारसे बना हुआ मध्यम और तीन भारसे बना हुआ कनिष्ठ कहा जाता है। स्वल्प वित्तवाला मनुष्य इसके आधे परिमाणसे भी काम चला सकता है। इसमें भी देवताओंका आमन्त्रण, पूजन, स्वर्णमय वृक्ष, देव-पूजन, विष्कम्भपर्वत, सरोवर, वन, देवता, हवन, जागरण और लोकपालोंकी स्थापना आदि धान्यपर्वतकी ही भाँति करनी चाहिये। उस समय यह मन्त्र उच्चारण करें—
यथा देवेषु विश्वात्मा प्रवरोऽयं जनार्दनः। सामवेदस्तु वेदानां महादेवस्तु योगिनाम्॥ प्रणवः सर्वमन्त्राणां नारीणां पार्वती यथा। तथा रसानां प्रवरः सदा चेक्षुरसो मतः॥ मम तस्मात् परां लक्ष्मीं प्रयच्छ गुडपर्वत। सुरासुराणां सर्वेषां नागयक्षक्षयन्त्रिणाम्॥ निवासश्चापि पार्वत्यास्तस्मान्मां पाहि सर्वदा।
(उत्तरपर्व १९७।५-८)
‘जिस प्रकार देवगणोंमें ये विश्वात्मा जनार्दन, वेदोंमें सामवेद, योगियोंमें महादेव, समस्त मन्त्रोंमें अकार और नारियोंमें पार्वती श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार रसोंमें इक्षुरस सदा श्रेष्ठ माना गया है। इसलिये गुडपर्वत! तुम मुझे उत्कृष्ट लक्ष्मी प्रदान करो। गुडपर्वत! चूँकि तुम देवताओं, असुरों, नागों, यक्षों, ऋक्षों तथा पार्वतीके भी निवासस्थान हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो।’ जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार गुडपर्वतका दान करता है, वह गन्धर्वोद्धार पूजित होकर गौरीलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा सौ कल्प व्यतीत होनेपर दीर्घायु एवं नीरोगतासे सम्पन्न होकर भूतलपर जन्म ग्रहण करता है और शत्रुओंके लिये अजेय
होकर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है। राजन्! इस गुडपर्वतदानकी महिमामें एक आख्यान है, उसे आप सुनें।
सुलभा नामकी एक महाभाग्यशालिनी व्रतपरायणा रानी थी। वह राजा मरुतकी प्यारी पत्नी थी और रूप-यौवनसे सम्पन्न थी। राजा मरुतके सात सौ रानियाँ थीं। ये सभी रानियाँ सुलभाकी आज्ञामें रहती थीं और राजा मरुत भी सुलभाके परामर्शको मानते थे। रानी भी राजासे अत्यन्त स्नेह करती थी। एक बारकी बात है कि दुर्वासामुनि राजाके यहाँ आये। राजा मरुतने अर्घ्य-पाद्यादिसे मुनिका सत्कार किया। दुर्वासाजीसे सुलभाने पूछा—‘भगवन्! किस पुण्यकर्मके प्रभावसे राजा मुझे अत्यन्त प्यार करते हैं। मेरा ही मुख देखते रहते हैं और मेरे वशमें हैं, मेरी सौतेँ भी मेरा प्रिय करनेमें तत्पर रहती हैं? ब्रह्मन्! यह सब आप बतलायें, इस विषयमें मुझे महान् कौतूहल है।’
दुर्वासाजी बोले—सुभगे! तुम अपने पूर्वजन्मके वृत्तान्तको सावधान होकर सुनो। मैं तुम्हारे पूर्वजन्मोंकी बातोंको अच्छी तरह जानता हूँ। पूर्वजन्ममें तुम गिरिव्रजपुर (राजगृह—विहार)—में निवास करनेवाले एक वैश्यकी स्त्री थी। तुम धार्मिक, सत्यशील और पतिव्रता थी। वहाँ तुमने अपने पतिके साथ ब्राह्मणोंसे गुडपर्वत-दानके माहात्म्य और विधिको सुना था। तब तुमने गुडपर्वतका विधिवत् दान किया। वरानने! उसीके प्रभावसे तुम यह सुखभोग प्राप्त कर रही हो।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! उस सुलभाने अन्तमें सद्गति प्राप्त की। इस गुडपर्वतका दान स्त्रियोंके लिये विशेषरूपसे बताया गया है।
(अध्याय १९६-१९७)
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- उत्तरपर्व *
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सुवर्ण एवं तिलशैलदान-विधि, तिलोंकी महिमा
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं पापहारी एवं श्रेष्ठ सुवर्णाचलकी दान-विधि बतला रहा हूँ, जिससे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। एक हजार पलका सुवर्णाचल उत्तम, पाँच सौ पलका मध्यम और ढाई सौ पलका अधम (साधारण) माना गया है। अल्प वित्तवाला भी अपनी शक्तिके अनुसार गर्वरहित होकर एक पलसे कुछ अधिक सोनेका पर्वत बनवा सकता है। नृपश्रेष्ठ! शेष सारे कार्योंका विधान धान्यपर्वतकी भाँति ही करना चाहिये। उसी प्रकार विष्कम्भपर्वतोंकी भी स्थापना कर इन मन्त्रोंसे प्रार्थना करे—
नमस्ते ब्रह्मबीजाय ब्रह्मगर्भाय वै नमः॥
यस्मादनन्तफलदस्तस्मात् पाहि शिलोच्चय।
यस्मादग्नेरपत्यं त्वं यस्मात् तेजो जगत्यतेः॥
हेमपर्वतरूपेण तस्मात् पाहि नगोत्तम।
(उत्तरपर्व ११८।४—६)
‘शिलोच्चय! तुम ब्रह्मके बीजरूप हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारे गर्भमें ब्रह्मा स्थित रहते हैं, अतः तुम्हें प्रणाम है। तुम अनन्त फलके दाता हो, इसलिये मेरी रक्षा करो। जगत्पति पर्वतोत्तम! तुम अग्निकी संतान और जगदीश्वर शिवके तेजःस्वरूप हो, अतः सुवर्णाचलके रूपसे मेरा पालन करो।’
जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे सुवर्णाचलका दान करता है, वह परम शिवलोकमें जाता है और वहाँ सौ वर्षोंतक निवास करनेके पश्चात् परमगतिको प्राप्त होता है।
राजन्! इसके बाद मैं तिलशैलदान-विधि बतला रहा हूँ, जिससे मनुष्य उत्तम विष्णुलोकको प्राप्त होता है। तिल अत्यन्त पवित्र हैं, पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले हैं। तिलकी उत्पत्ति विष्णुके
शरीरसे हुई है, इसलिये इन्हें उत्तम बतलाया गया है। मधु-कैटभ नामके दो राक्षस दितिके पुत्र थे। भगवान् विष्णुके साथ मधु दैत्यका अनवरत युद्ध चलता रहा। फिर भी दानव मरा नहीं। इसपर भगवान् विष्णु अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। उनके शरीरसे स्वेदकी बूँदें पृथिवीपर गिरीं और इधर-उधर बिखर गयीं। उसीसे तिल, उड़द एवं कुश उत्पन्न हुए। भगवान् विष्णुने बलवानोंमें बली उस मधुको मार डाला। उसी मधुके मेद (चर्बी)-से सम्पूर्ण पृथ्वी रँग गयी। इसलिये पर्वतोंको धारण करनेवाली पृथ्वीका नाम मेदिनी पड़ा। जब मधु दैत्य मारा गया तो सभी देवता प्रसन्न हो भगवान् विष्णुकी स्तुति करते हुए कहने लगे—‘देव! आपने ही संसारको धारण किया है। संसारकी सृष्टि आपने ही की है। मधुसूदन! यह सारा संसार अन्तमें आपमें ही लीन होता है। संसारका कल्याण करनेके लिये ये तिल आपके ही अङ्गसे उद्भूत हैं। देवेश! आप हम सबकी रक्षा करें।’
देवताओंकी यह स्तुति सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—देवगणो! ये तिल तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले हैं। शुक्लपक्षमें देवताओंको और कृष्णपक्षमें पितरोंको तिलोदक देना चाहिये। सात या आठ बार तिलोदककी अञ्जलि देनेसे देवता और पितर संतुष्ट हो जाते हैं और देनेवालेका मङ्गल करते हैं। कुत्ते, कौए और पतियोंसे दूषित वस्तु तिलोंके अभ्युक्षण करनेसे पवित्र हो जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं। इस प्रकार जो तिलपर्वतका दान ब्राह्मणको करता है, उसका दिया हुआ दान अक्षय होता है।
राजेन्द्र! दस द्रोण तिलका बना हुआ तिलशैल
१-देवीभागवत, हरिवंश आदि पुराणोंमें मधुके मेदसे उत्पन्न होनेके कारण पृथ्वीका नाम मेदिनी पड़ा। यहाँ भी यही भाव है।
२-शकाकोपहतं यच्च पतितादिभिरेव च। तिलैरभ्युक्षितं सर्वं पवित्रं स्यान्न संशयः॥ (उत्तरपर्व ११९।१५)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
उत्तम, पाँच द्रोणका मध्यम और तीन द्रोणका कनिष्ठ बतलाया गया है। इसके चारों दिशाओंमें विष्कम्भपर्वतोंकी स्थापना तथा अन्यान्य सारा कार्य पूर्ववत् करना चाहिये। नृपश्रेष्ठ! तिलाचलकी प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिये—
यस्मान्मधुवधे विष्णोर्दहैस्वेदसमुद्भवः।
तिलाः कुशाश्च माषाश्च तस्माच्छं नो भवन्तिवह॥
हव्ये कव्ये च यस्माच्च तिलैरैवाभिमन्त्रणम्।
भवादुद्भर शैलेन्द्र तिलाचल नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व १९९।१९-२०)
‘चूँकि मधुदैत्यके वधके समय भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुए पसीनेकी बूँदोंसे तिल, कुश और उड़दकी उत्पत्ति हुई थी, इसलिये तुम इस लोकमें हम सबका कल्याण
करो। शैलेन्द्र तिलाचल! चूँकि देवताओंके हव्य और पितरोंके कव्य—दोनोंमें तिलोंसे ही अभिमन्त्रण किया जाता है, इसलिये तुम मेरा भवसागरसे उद्भार करो, तुम्हें नमस्कार है।’
इस प्रकार आमन्त्रित कर जो मनुष्य श्रेष्ठ तिलाचलका दान करता है, वह पुनरागमनरहित विष्णुपदको प्राप्त हो जाता है। उसे इस लोकमें दीर्घायुकी प्राप्ति होती है, वह पुत्र एवं पौत्रोंको प्राप्त कर उनके साथ आनन्द मनाता है तथा अन्तमें देवताओं, गन्धर्वों और पितरोंद्वारा पूजित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है। इस दानके माहात्म्यको सुननेसे कपिलादानका पुण्य प्राप्त होता है।
(अध्याय १९८-१९९)
कपास एवं घृतपर्वतोंके दानकी महिमा
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं कपासपर्वतके दानकी विधि बता रहा हूँ। यह सभी दानोंमें श्रेष्ठ और समस्त देवताओंको परम प्रिय है। अपने कुटुम्बका उद्भार करनेके लिये उपयुक्त देश-काल और धनको प्राप्तकर श्रद्धापूर्वक इस महादानको यत्नपूर्वक करना चाहिये। बीस भार रूईसे बना हुआ कपासपर्वत उत्तम, दस भारसे बना हुआ मध्यम और पाँच भारसे बना हुआ अधम (साधारण) कहा गया है। अल्प सम्पत्तिवाला मनुष्य कृपणता छोड़कर एक भार कपासके बने हुए पर्वतका दान कर सकता है। नृपश्रेष्ठ! धान्यपर्वतकी भाँति सारी सामग्री एकत्र कर रात्रिके व्यतीत होनेपर प्रातःकाल इस दानको करना चाहिये। उस समय यह मन्त्र पढ़े—
त्वमेवावरणं यस्माल्लोकानामिह सर्वदा।
कार्पासाचल नस्तस्मादधीघव्यंसनो भव॥
(उत्तरपर्व २००।७)
‘कार्पासाचल! चूँकि इस लोकमें तुम्हीं सदा सभी लोगोंके शरीरके आच्छादन हो, इसलिये तुम्हें नमस्कार है। तुम मेरे पापसमूहका विनाश कर दो।’ इस प्रकार जो मनुष्य भगवान् शिवके संनिधानमें कार्पासाचलका दान करता है, वह एक कल्पतक रुद्रलोकमें निवास करनेके पश्चात् भूतलपर सौभाग्यशाली राजा होता है।
राजन्! इसके बाद मैं दिव्य तेजसे सम्पन्न अमृतमय और महान्-से-महान् पापोंके विनाशक श्रेष्ठ घृताचलदानका वर्णन कर रहा हूँ। पचास घड़े घीसे बना हुआ घृताचल उत्तम, पचीससे मध्यम और उसके आधेसे अधम (साधारण) कहा गया है। अल्प वित्तवाला भी यदि करना चाहे तो वह यथाशक्ति घृताचलकी रचना करके दान कर सकता है। उसके चतुर्थीशसे विष्कम्भपर्वतोंकी भी कल्पना करनी चाहिये। उन सभी घड़ोंके ऊपर अगहनी चावलसे परिपूर्ण पात्र रखा जाय और
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- उत्तरपर्व *
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उन्हें विधिपूर्वक एकके ऊपर एक रखकर ऊँचा कर देना चाहिये। उन्हें श्वेत वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर उनके निकट गन्ना और फल आदि रख दे। इसमें शेष सारा विधान धान्यपर्वतकी ही भाँति बतलाया गया है। देवताओंकी स्थापना, उनका अर्चन और हवन भी उसी प्रकार करना चाहिये। रात्रि व्यतीत होनेपर प्रातःकाल यजमान शान्त मनसे वह घृताचल गुरुको निवेदित कर दे। उसी प्रकार विष्कम्भपर्वतोंको भी ऋत्विजोंको दान कर दे, उस समय इस मन्त्रका पाठ करना चाहिये— संयोगादघृतमुत्पन्नं यस्मादमुत्ततेजसोः। तस्मादघृताचलश्चास्मात् प्रीयतां मम शंकरः ॥
यस्मात् तेजोमयं ब्रह्मा घृते नित्यं व्यवस्थितम्। घृतपर्वतरूपेण तस्मान्नः पाहि भूधर ॥
(उत्तरपर्व २०१।८-९)
‘चूँकि अमृत और अग्निके संयोगसे घृत उत्पन्न हुआ है, इसलिये घृताचलरूप शंकर इस व्रतसे प्रसन्न हों। चूँकि ब्रह्म तेजोमय है और घीमें विद्यमान है, ऐसा जानकर घृतपर्वतरूप मूधर! हमारी रक्षा करो।’ जो मनुष्य इस विधिसे इस श्रेष्ठ घृताचलका दान करता है, वह महापापी होनेपर भी शिवलोकको प्राप्त होता है।
(अध्याय २००-२०१)
रत्नाचल और रौप्याचलदानका माहात्म्य
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं श्रेष्ठ रत्नाचलदान-विधिका वर्णन कर रहा हूँ। इससे दाता सप्तर्षिलोक प्राप्त करता है। एक हजार मुक्ताफल (मोतियों)-द्वारा बना हुआ पर्वत उत्तम, पाँच सौसे बना हुआ मध्यम और तीन सौसे बना हुआ अधम (साधारण) माना गया है। अल्पवित्त व्यक्ति सौ मुक्ताफलोंसे रत्नाचलका दान करे। कल्पित पर्वतके चतुर्थांशसे उसके चारों दिशाओंमें विष्कम्भपर्वतोंको स्थापित करना चाहिये। विद्वानोंको पूर्व दिशामें हीरा और गोमेदसे मन्दराचलकी, दक्षिणमें पुष्पराग (पुखराज) और इन्द्रनील (नीलम) मणिके संयोगसे गन्धमादनकी, पश्चिममें वैदूर्य और मूँगैके सम्मिश्रणसे विपुलाचलकी और उत्तरमें गारुत्पत मणिसहित पद्मराग (माणिक्य) मणिसे सुपार्श्व पर्वतकी स्थापना करनी चाहिये। इस दानमें भी धान्यपर्वतकी तरह सारे उपकरणोंकी कल्पना करे। उसी प्रकार स्वर्णमय देवताओं, वनों और वृक्षोंका स्थापन एवं आवाहन करे तथा पुष्प, गन्ध आदिसे उनका पूजन करे। प्रातःकाल
मत्सररहित होकर वह सारा सामान गुरु और ऋत्विजोंको दान कर दे। उस समय इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—
यथा देवगणाः सर्वे सर्वरत्नेष्ववस्थिताः। त्वं च रत्नमयो नित्यमतः पाहि महाचल ॥ यस्माद्वलप्रदानेन तुष्टिमेति जनार्दनः। पूजारत्नप्रदानेन तस्मान्नः पाहि सर्वदा ॥
(उत्तरपर्व २०१।८-९)
‘अचल! जब सभी देवगण सम्पूर्ण रत्नोंमें निवास करते हैं, तब तुम तो नित्य रत्नमय ही हो, अतः महाचल! हमारी रक्षा करो। पर्वत! चूँकि सदा रत्नका दान करनेसे श्रीहरि संतुष्ट हो जाते हैं, अतः तुम हमारी रक्षा करो।’
जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे रत्नमय पर्वतका दान करता है, वह इन्द्रसे सत्कृत हो विष्णु-सालोक्यको प्राप्त करता है और वहाँ सौ कल्पोंसे भी अधिक कालतक निवास करता है। पुनः इस लोकमें जन्म लेनेपर वह सौन्दर्य, नीरोगता और सदगुणोंसे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधीश्वर
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
होता है। साथ ही उसके द्वारा इहलोक अथवा परलोकमें जो कुछ भी ब्रह्महत्या आदि पाप किये गये होते हैं, वे सभी उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे वज्रद्वारा प्रहार किया गया हुआ पर्वत।
नरोत्तम! इसके बाद मैं सर्वश्रेष्ठ रजतशैलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसके दानसे मनुष्य सर्वश्रेष्ठ चन्द्रलोकको प्राप्त करता है। दस हजार पल चाँदीसे बना हुआ रजताचल उत्तम, पाँच हजार पलसे बना हुआ मध्यम और ढाई हजार पलसे बना हुआ अधम कहा गया है। यदि दाता ऐसा करनेमें असमर्थ हो तो उसे अपनी शक्तिके अनुसार बीस पलसे कुछ अधिक चाँदीद्वारा पर्वतका निर्माण कराना चाहिये। उसी प्रकार प्रधान पर्वतके चतुर्थांशसे विष्कम्भपर्वतोंकी भी रचना करे। पहलेकी तरह चाँदीके द्वारा मन्दर आदि पर्वतोंका निर्माण कर उनके नितम्बभागको सोनेसे सुशोभित कर दे। उनपर लोकपालोंकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित कर उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और सूर्यकी मूर्तियोंसे भी संयुक्त कर दे। तत्पश्चात् बुद्धिमान् दाता इन सबकी विधिपूर्वक
अर्चना करे। सारांश यह है कि अन्य पर्वतोंमें जो उपकरण चाँदीके होते हैं, वे सभी इसमें सुवर्णके होने चाहिये। शेष हवन, जागरण आदि सारे कार्य धान्यपर्वतकी भाँति ही करे। तत्पश्चात् प्रातःकाल वस्त्र और आभूषण आदिके द्वारा गुरु और ऋत्विजोंका पूजन कर रजताचल गुरुको और विष्कम्भपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे। उस समय मत्सररहित हो हाथमें कुश लेकर इस मन्त्रका पाठ करे—
पितृणां वल्लभं यस्माद्धरीन्द्राणां शंकरस्य च। रजत पाहि तस्मान्नो घोरात् संसारसागरात्॥
(उत्तरपर्व २०३।८)
‘रजताचल! तुम पितरोंको तथा श्रीहरि, सूर्य, इन्द्र और शिवको परम प्रिय हो, इसलिये शोकरूपी संसारसागरसे मेरी रक्षा करो।’ जो मानव इस प्रकार निवेदन कर श्रेष्ठ रजताचलका दान करता है, वह दस हजार गो-दानका फल प्राप्त करता है। वह विद्वान् चन्द्रलोकमें गन्धर्वों, किन्नरों और अप्सराओंके समूहोंसे पूजित होकर प्रलयकालतक निवास करता है। (अध्याय २०२-२०३)
शर्कराचल और लवणाचल-दानकी महिमा
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं परमोत्तम शर्कराचल-दानका वर्णन कर रहा हूँ। जिससे भगवान् विष्णु, रुद्र और सूर्य सदा संतुष्ट रहते हैं। आठ भारका शर्कराचल उत्तम, चार भारका मध्यम और दो भारका अधम कहा गया है। जो मानव स्वल्प सम्पत्तिवाला हो, वह एक भार अथवा आधे भारका भी शर्कराचल बनवा सकता है। प्रधान पर्वतके चतुर्थांशसे विष्कम्भपर्वतोंकी भी निर्माण करना चाहिये। पुनः धान्यपर्वतकी तरह सारी सामग्री प्रस्तुत करके मेरुपर्वतकी भाँति इसके ऊपर भी स्वर्णमयी देवमूर्तिके
साथ मन्दार, पारिजात और कल्पवृक्ष—इन तीनों वृक्षोंकी भी स्वर्णनिर्मित मूर्ति स्थापित करे। इन तीनों वृक्षोंको प्रायः सभी पर्वतोंपर स्थापित कर देना चाहिये। सभी पर्वतोंके पूर्व और पश्चिम भागमें हरिचन्दन और कल्पवृक्षको निविष्ट करना चाहिये। शर्कराचलमें तो इसका विशेषरूपसे ध्यान रखना चाहिये। कदम्ब-वृक्षके नीचे मन्दराचलपर कामदेवकी मूर्ति, जम्बू-वृक्षके नीचे गन्धमादनके शिखरपर भगवान् विष्णुकी मूर्ति, विपुलाचलपर सोनेकी हंसकी मूर्ति पूर्वाभिमुखी और स्वर्णमयी गौकी मूर्ति दक्षिणाभिमुखी होनी चाहिये।
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- उत्तरपर्व *
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तत्पश्चात् आवाहन, यज्ञ आदि सारा विधान धान्यपर्वतकी तरह करके अन्तमें इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए बीचका प्रधान पर्वत गुरुको और चारों विष्कम्भपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे। वे मन्त्र इस प्रकार हैं—
सौभाग्यामृतसारोऽयं परमः शर्करायुतः ॥ यस्मादानन्दकारी त्वं भव शैलेन्द्र सर्वदा। अमृतं पिबतां ये तु निष्येतुर्भुवि शीकराः ॥ देवानां तत्समुत्थोऽसि पाहि नः शर्कराचल। मनोभवधनुर्मध्यादुद्भूता शर्करा यतः ॥ तन्मयोऽसि महाशैल पाहि संसारसागरात्।
(उत्तरपर्व २०४।१०—१३)
‘शैलेन्द्र ! यह शक्करद्वारा निर्मित पर्वत सौभाग्य और अमृतका सार है, इसलिये तुम मेरे लिये सदा आनन्दकारक होओ। शर्कराचल ! देवताओंके अमृतपान करते समय जो बूँदें भूतलपर टपक पड़ी थीं, उन्हींसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई है, अतः तुम हमारी रक्षा करो। महाशैल ! चूँकि शर्करा कामदेवके धनुषके मध्यभागसे प्रादुर्भूत हुई है और तुम शर्करामय हो, इसलिये संसारसागरसे मुझे बचाओ।’
जो मनुष्य इस विधिके अनुसार शर्कराशैलका दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको प्राप्त हो जाता है। वहाँ वह भगवान् विष्णुकी आज्ञासे अपने आश्रितोंके साथ ही सूर्य, चन्द्र और तारागणोंके समान कान्तिमान् विमानपर आरूढ होकर सुशोभित होता है। पुनः सौ कल्पोंके बाद तीन अयुत जन्मोंतक भूतलपर दीर्घायु और नीरोगतासे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधिपति होता है। सभी पर्वतदानोंमें मत्सररहित होकर अपनी शक्तिके अनुसार भोजन करानेका विधान है। गुरुकी आज्ञासे अपनी शक्तिके अनुकूल स्वयं भी क्षार (नमक)-रहित भोजन करना चाहिये। पुनः पर्वतदानकी सारी सामग्री ब्राह्मणके घर स्वयं भेजवा देनी चाहिये।
राजन् ! अब आप लवणाचल-दानकी महिमामें एक आख्यान सुनें—पहले ब्रह्मकल्पमें धर्ममूर्ति नामक एक राजा हुआ था। उसके तेजके सामने सूर्य और चन्द्रमा आदि भी कान्तिहीन हो जाते थे। वह इन्द्रका मित्र था। उसने हजारों दैत्योंका वध किया था। वह इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाला मनुष्य होनेपर भी किसीसे परास्त नहीं हुआ, अपितु उसके द्वारा सैकड़ों शत्रु पराजित हो चुके थे। उसकी पत्नीका नाम भानुमती था। वह त्रिलोकोंमें सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी थी। उसने सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मीके समान अपने दिव्य रूपसे देवाङ्गनाओंको भी पराजित कर दिया था। वह दस हजार नारियोंके बीचमें लक्ष्मीकी तरह सुशोभित होती थी। राजा धर्ममूर्तिकी वह पटरानी उसे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। एक बार सभामण्डपमें पधारे अपने पुरोहित महर्षि वसिष्ठसे उस राजाने विस्मय-विमुग्ध हो ऐसा प्रश्न किया—
‘भगवन् ! किस धर्मके प्रभावसे मुझे सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई है तथा किस धर्मके फलस्वरूप मेरे शरीरमें सदा प्रचुरमात्रामें उत्तम तेज विराजमान रहता है ?’
वसिष्ठजीने कहा—राजन् ! पूर्वकालमें लीलावती नामकी एक वेश्या थी। वह शिवजीकी भक्त थी। उसने चतुर्दशी तिथिके दिन विधिपूर्वक अपने गुरुको स्वर्णमय वृक्ष आदि उपकरणोंसहित लवणाचलका दान किया था। उन दिनों लीलावतीके घर एक शुद्धजातीय शौण्ड नामक सोनार नौकर था। भूपाल ! उसने ही श्रद्धापूर्वक सुवर्णद्वारा वृक्षों और प्रधान देवताओंकी मूर्तियोंका निर्माण किया था। उसने बिना कुछ पारिश्रमिक लिये उन मूर्तियोंको गढ़कर अत्यन्त सुन्दर बनाया था और यह धर्मका कार्य है—ऐसा जानकर किसी भी प्रकारका कुछ वेतन भी उसने नहीं लिया था। पृथ्वीपते ! उस स्वर्णकारकी पत्नीने भी उन सुवर्णनिर्मित देवों एवं वृक्षोंकी मूर्तियोंको रगड़कर चमकीला बनाया था और
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
लीलावतीके पर्वतदानमें बड़ी परिचर्या की थी। उन दोनोंकी सहायतासे लीलावतीने गुरुशुश्रूषा आदि कार्योंको सम्पन्न किया था। अधिक कालके व्यतीत होनेपर वह वेश्या लीलावती समस्त पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको चली गयी। वह सोनार, जो दरिद्र होते हुए भी अत्यन्त सामर्थ्यशाली था और जिसने वेश्यासे कुछ भी मूल्य नहीं लिया था, इस समय इस जन्ममें तुम हो, जो दस हजार सूर्योंके समान कान्तिमान् और सातों द्वीपोंके अधीश्वररूपसे उत्पन्न हुए हो। सोनारकी जिस पत्नीने स्वर्णनिर्मित वृक्षों एवं देवमूर्तियोंको अत्यन्त चमकीला बनाया था, वही यह भानुमती तुम्हारी पटरानी है।
मूर्तियोंको उज्ज्वल करनेके कारण इसे इस जन्ममें सुन्दर गौरवर्णका शरीर और भुवनेश्वरीका पद प्राप्त हुआ है। चूँकि तुम दोनोंने दत्तचित्त होकर रात्रिमें लवणाचलके दान-प्रसंगमें सहायकरूपसे कर्म किया था, इसीलिये तुम्हें लोकमें अजेयता, नीरोगता, सौभाग्यसम्पन्नता और लक्ष्मीकी प्राप्ति
हुई है। इस कारण तुम भी इस जन्ममें विधानपूर्वक दस प्रकारके धान्याचल आदि पर्वतोंका दान करो। तब राजा धर्ममूर्तिने 'ऐसा ही करूँगा।' कहकर वसिष्ठजीके वचनोंका आदर किया और सैकड़ों बार धान्याचल आदि सभी पर्वतोंका दान किया, जिसके फलस्वरूप देवगणोंद्वारा पूजित होकर भगवान् पुरारिके लोकको प्राप्त हुआ। निर्धन मनुष्य भी यदि उत्कृष्ट भक्तिपूर्वक इन पर्वतदानोंको देखता है, मनुष्योंद्वारा दान करते समय उनका स्पर्श कर लेता है, उनकी कथाएँ सुनता है और उन्हें करनेके लिये सम्मति देता है तो वह भी पापरहित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है। नृपश्रेष्ठ! जब इस लोकमें मनुष्यद्वारा भव-भयको विदीर्ण करनेवाले इन शैलेन्द्रोंके प्रसंगका पाठ करनेसे दुःस्वप्न शान्त हो जाते हैं, तब जो मनुष्य स्वयं शान्तिचित्तसे विधिपूर्वक इन सम्पूर्ण पर्वतदानोंको करता है, वह विष्णुलोक तथा शिवलोकको प्राप्त करता है तो इसमें क्या आश्चर्य? (अध्याय २०४)
सदाचारधर्मका निरूपण
महाराज युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! मैंने आपसे प्रतिपदा आदि तिथियोंके दानको क्रमशः विस्तारसे सुना, सभी रहस्यों तथा मन्त्रोंके साथ व्रत एवं दान आदिके प्रारम्भ और उद्यापन-विधियोंको सुना। यज्ञ-यागादि दानधर्मों, स्नानविधि, उत्सवों तथा इष्टापूर्तकर्मोंके विषयमें भी सुना। फिर भी मधुसूदन! मेरा मन सशंकित हो रहा है, क्योंकि व्रतोंके प्रसंगमें आपने विविध देवताओंका वर्णन किया है। देवकीपुत्र! आपने देवताओंका नानात्त्व प्रदर्शन किया तथा तिथिके क्रमसे अलग-अलग मन्त्र आदिको भी बतलाया है। परंतु ध्यान-योगपरायण व्यासादि मुनियोंने केवल अव्यय, सर्वगत, निर्विकार एक परमात्माका ही वर्णन
किया है, इसमें क्या रहस्य है? प्रभो! आपने अनेक विषय बतलाये, पर वर्णाश्रमके आचार और धर्मोंका निरूपण नहीं किया। ये सभी महर्षिगण आपकी वाणी सुननेके लिये उत्सुक हैं। इस विषयको आप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— राजन्! व्रतों और दानोंका तो मैंने सारांशरूपसे वर्णन किया है। विशेष वर्णन तो भगवती सरस्वती ही कर सकती हैं। सभी वर्णाश्रमोंका सामान्य धर्म यही है कि सभी प्राणी विघ्नरहित हों और सभी कल्याणके भागी बनें। यहाँपर जो मैंने देवताओंके उद्देश्यसे व्रतोंका आपसे वर्णन किया है, उसमें भी मूलतः एक परमात्मदेवका ही वर्णन हुआ है। जो ब्रह्मा हैं
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- उत्तरपर्व *
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वही हरि, वही महेश्वर, वही सूर्य, वही अग्नि, वही कार्तिकेय और वही विनायक हैं, गौरी, लक्ष्मी और सावित्री ये भी एक ही शक्तिके भिन्न-भिन्न रूप हैं, मूलतः एक ही तत्त्व है। किसी देवता या देवीको उद्देश्यकर जो मनुष्य व्रत करता है, उसे वहाँपर देवी-देवताका भेद नहीं जानना चाहिये, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् शिव-शक्तिमय है। जैसे अग्नि, वायु एवं जलके भेदसे वसुधाके अनेक भेद प्रतीत होते हैं, किंतु पारमार्थिक दृष्टिसे विचार करनेपर भेदका भान नहीं होता है।
पार्थ! वेदधर्मके अनुसार जो कोई भी जिस किसी भी देवताका आश्रयण कर जिस किसी भी दान अथवा व्रतको करता है, उन सबके मूलमें वस्तुतः एक ही परमात्माकी उपासना होती है। मैंने जो व्रत-दानकी विधियाँ कही हैं, वे सदाचारीको ही फलप्रद होती हैं, आचारहीनको नहीं। आचारहीन व्यक्तिको छः अङ्गोंके साथ अधीत वेद भी पवित्र नहीं कर सकते। जैसे पक्षी पंख निकलनेके बाद अपने घोंसलेको छोड़ देता है, वैसे ही ये वेद आचारहीनको मृत्युके समय परित्याग कर देते हैं१। जैसे कपालमें रखा जल, कुत्तेके चर्मपात्र (मशक)- में रखा दूध स्थानदोषसे अशुद्ध हो जाता है, इसी प्रकार आचारहीन व्यक्ति भी अशुद्ध ही है। इसलिये वृत्त (आचार)-की यन्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये, क्योंकि धन तो आता-जाता रहता है। जो धनसे हीन है, वह दीन नहीं, किंतु जो
आचारसे गिरा हुआ है वह गिरा ही रहता है, वह मेरे हुएके समान है। राजन्! इस प्रकार आचार ही धर्म और कुलका मूल है। आचारसे च्युत व्यक्ति न कुलीन होता है और न धार्मिक होता है। दुरात्मा व्यक्तिके बहुत बड़े कुलसे क्या लाभ? क्या सुगन्धित पुष्पमें कीड़े नहीं रहते? इसी प्रकार उत्तम कुलमें भी दुराचारी उत्पन्न हो जाते हैं। हीन जातिमें उत्पन्न व्यक्ति भी यदि शौचाचारसम्पन्न है और सभी धर्मोंको जानता है तो वह सज्जनोंमें कुलीन और श्रेष्ठ है। कुलको कुल नहीं कहा जाता, बल्कि सदाचार ही कुल है। राजन्! जो व्यक्ति सदाचार-सम्पन्न है, वह इस लोक और परलोक दोनोंमें आनन्द प्राप्त करता है२।
राजन्! आचारसे धर्म उत्पन्न है और संत ही सदाचारके मूल हैं। उनका आचार ही सदाचार है। इसलिये जो अपना कल्याण चाहता है, उसे सदाचारका पालन करना चाहिये। सदाचारके पालनसे दोष-पाप नष्ट हो जाते हैं। संसार जिसे न ठीकसे देखता है और न जिसका कभी परिचय पाता है, वह यदि सदाचारी और धर्मात्मा (पुण्यश्लोक राम, नल, युधिष्ठिर आदिकी तरह) है तो तीनों कालमें उसे श्रेष्ठ मानकर सभी आदरकी दृष्टिसे स्मरण करते रहते हैं और सभी उसका प्रिय करते हैं। जो नास्तिक, ईश्वरीय आस्थासे रहित तथा गुरुओं एवं शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करते हैं, अधर्मज्ञ एवं दुराचारी हैं, वे मानो मृतक-तुल्य हैं, पर यदि
१-आचारहीन न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीताः सह षड्भिर्ब्रह्मैः। छन्दास्थेन मृत्युकाले त्यजन्ति नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः ॥
(उत्तरपर्व २०५।१७)
यह श्लोक वसिष्ठ, गौतम आदि धर्मसूत्रों और प्रायः अनेक पुराणों एवं धर्मशास्त्रोंमें भी इसी प्रकार प्राप्त होता है।
२-कपालस्थं यथा तोयं श्रुतौ वा यथा पयः। दुष्टं स्यात् स्थानदोषेण वृत्तहीने तथाशुभम् ॥
वृत्तं यनेन संरक्षेद् वितमेति प्रयाति च। अहीनो वित्तो हीनो वृत्तस्तस्य हतो हतः ॥
एवमाचारधर्मस्य मूलं राजन् कुलस्य च। आचारान्नि च्युतो जन्तुनं कुलीनो न धार्मिकः ॥
किं कुलेनोपदिष्टेन विपुलेन दुरात्मनाम्। क्रमयः किं न जायन्ते कुसुमेषु सुगन्धिषु ॥
हीनजातिप्रसृतोऽपि शौचाचारसमन्वितः। सर्वधर्मार्थकुशलः स कुलीनः सतां वरः ॥
न कुलं कुलमित्यादुराचारः कुलमुच्यते। आचारकुशलो राजन्मिह चामुत्र नन्दते ॥ (उत्तरपर्व २०५।१८-२३)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कोई व्यक्ति सम्पूर्ण लक्षणोंसे हीन होते हुए भी सदाचार-सम्पन्न, श्रद्धालु और अनिन्दक है तो वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।
मानवको चाहिये कि ब्राह्म-वेलामें जग जाय और धर्म तथा अर्थके विषयमें विचार करे। कभी भी ब्राह्मण, अग्नि, गौ तथा सूर्यके सम्मुख मल-मूत्रका उत्सर्जन नहीं करना चाहिये। दिनमें उत्तराभिमुख और रात्रिमें दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्रका विसर्जन करना चाहिये। प्रातःकाल नित्य-क्रियासे निवृत्त हो आचमनके अनन्तर समाहित होकर प्रातः-संध्या करनी चाहिये। इसी प्रकार वाणीपर नियन्त्रण कर मौन होकर सायं-संध्या करे। भगवान् सूर्यको उगते हुए तथा अस्त होते हुए नहीं देखना चाहिये। ऋषियोंने दीर्घकालीन तपस्या आदिसे दीर्घायुको प्राप्त किया। धार्मिक राजाको चाहिये कि जो द्विज प्रातः तथा सायं-संध्या नहीं करता, उसे शुद्ध-कर्ममें नियोजित कर दे। मूत्र-पुरीषमें यदि वेग हो जाय या कोई बाधा उपस्थित हो जाय तो उस समय विधि एवं नियमकी अपेक्षा न करे। पृथ्वीको तुणोंसे तथा सिरको वस्त्रसे आच्छादितकर मल त्याग करना चाहिये। ग्राम, आश्रम, तीर्थ, क्षेत्र, मार्ग, जुते खेत, गोष्ठ और गौओंके मार्ग आदि स्थानोंमें मूत्रादिका परित्याग नहीं करना चाहिये। जलके अंदरकी, आश्रम आदिकी, वल्मीककी, चूहिके बिलकी तथा शौचसे बची—इन पाँच प्रकारकी मिट्टियोंका शौच आदिमें प्रयोग न करे।
देवताओं आदिकी पूजा, गुरुओंका अभिवादन तथा भोजन आदि क्रियाएँ आचमन करनेके अनन्तर करनी चाहिये। फेनरहित, सुगन्धित निर्मल जलसे पूर्व या उत्तराभिमुख हो आचमन करना चाहिये। विद्वानोंको धर्म-अर्थ तथा कामके कार्योंको करना चाहिये। धर्म-अर्थ तथा काम इस त्रिवर्गके सम्पादनसे गृहस्थको ऐहिक और पारलौकिक सिद्धि प्राप्त होती है। बुद्धिमान् व्यक्तिको अपने न्यायोपार्जित
द्रव्यके एक भागसे परलोक-सम्बन्धी पुण्यकर्मोंका सम्पादन करना चाहिये। एक भागका संचय करे और आधे अर्थात् दो भागका भोजन, व्यवहार तथा नित्य-नैमित्तिक कार्योंमें व्यय करे। अतः न्यायपूर्वक धनके उपार्जनके लिये प्रयत्न करना चाहिये, क्योंकि धनके माध्यमसे ही धर्म-काम आदि पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। पूर्वाह्नकालमें ही केशप्रसाधन, आदर्शदर्शन, दन्तधावन तथा देवताओंका पूजन आदि कर लेना चाहिये। मल-मूत्रादि क्रियाएँ घरसे दूर करनी चाहिये तथा घरका जूठन आदि भी दूर फेंकना चाहिये। मिट्टीके ढेलेको तोड़नेवाला, तिनकोंको टुकड़े-टुकड़े करनेवाला, नख काटकर खानेवाला, नित्य उच्छिष्ट भोजन करनेवाला तथा वस्तुओंमें मिलावट करनेवाला इस संसारमें अधिक दिनोंतक नहीं जीता। दूसरेकी स्त्रीको नग्न नहीं देखना चाहिये, अपने पुरीष (मल)-को भी न देखे। रजस्वला स्त्रीको न देखे, न उसका स्पर्श करे और न उससे वार्तालाप करे। जलमें मूत्र-पुरीषका उत्सर्ग तथा मैथुन नहीं करना चाहिये। केश, राख, कपाल, मल-मूत्र, भूसी, अंगार, अस्थिपंजर तथा रस्सी आदिपर न बैठे। विद्वानोंको चाहिये कि ब्राह्मणोंको प्रणाम करें तथा उन्हें बैठनेके लिये आसन प्रदान करें, जाते समय कुछ दूरतक उन्हें पहुँचाने जायँ। टूटे-फूटे आसनपर न बैठे और फूटे हुए काँसेके पात्रोंका उपयोग न करे। बालोंको खोलकर भोजन न करे। नग्न होकर स्नान और शयन न करे। जूठे स्थानपर न बैठे। जूठे हाथसे सिरका स्पर्श न करे, क्योंकि सभी प्राण सिरमें स्थित रहते हैं। सिरके बालोंको न खींचे और न सिरपर प्रहार करे। पुत्र और शिष्यको कोड़े-से नहीं मारना चाहिये। अपने सिरको दोनों हाथोंसे एक साथ नहीं खुजलाना चाहिये। बिना कारण सिरसे स्नान नहीं करना चाहिये। ग्रहणके बिना रात्रि-स्नान नहीं करना चाहिये। भोजनके अनन्तर तथा अथाह जलमें डुबकी लगाकर स्नान नहीं
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- उत्तरपर्व *
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करना चाहिये। स्नान करनेके बाद तेल नहीं लगाना चाहिये। तिलपिष्ट नहीं खाना चाहिये, क्योंकि इससे आयु क्षीण होती है।
अपने गुरुजनों तथा श्रेष्ठजनोंसे बुरी बात न बोले। यदि वे क्रुद्ध दिखायी दें तो उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। दूसरेकी निन्दाजनक बात नहीं सुननी चाहिये और न स्वयं करनी चाहिये। प्रशस्त ओषधियोंका ही सेवन करना चाहिये। रत्नोंको धारण करना चाहिये। अपने केशोंको स्निग्ध और निर्मल रखना चाहिये। सुन्दर शिष्ट वेष धारण करना चाहिये। सफेद, प्रिय लगनेवाले फूलोंको धारण करना चाहिये। दूसरेके किञ्चिन्मात्र धनको न लेना चाहिये और न कभी अप्रिय बोलना चाहिये। सत्य और प्रिय वाणी बोलनी चाहिये। दूसरेके दोषोंको नहीं कहना चाहिये। किसीसे वैर बाँधना नहीं चाहिये। दुष्ट यानमें न चढ़े। नदीके किनारेकी छाया आदिका आश्रय नहीं लेना चाहिये। विद्वेषी, पतित, उन्मत्त, बहुतोसे वैर करनेवाले, वर्णसंकर, वन्ध्या, वन्ध्याके पति, नीच, असत्य भाषण करनेवाले, अत्यन्त खर्चीले स्वभाववाले, दूसरेकी व्यर्थ निन्दा करनेवाले तथा शठसे विद्वान् व्यक्तिको मैत्री नहीं करनी चाहिये। मार्गमें एकाकी गमन न करे। अतिशय वेगसम्पन्न जलमें स्नान न करे। जलते हुए घरमें प्रवेश न करे। वृक्षके ऊपरतक न चढ़े। शवके प्रति हुंकार न करे। दांतोंको परस्पर रगड़ना नहीं चाहिये। नासिका फुलाना नहीं चाहिये। मुखको अधिक खोलकर नहीं बोलना चाहिये। ऊँचे स्वरमें हँसना नहीं चाहिये और शब्द करते हुए अपान वायुका परित्याग नहीं करना चाहिये। नखसे नख नहीं बजाना चाहिये, न छेदन करना चाहिये और न पृथ्वीपर लिखना ही चाहिये। दाढ़ी-मूँछके बालोंका भक्षण नहीं करना चाहिये, पैरसे पैरका आक्रमण
नहीं करना चाहिये। गुरुके सम्मुख उच्च आसनपर नहीं बैठना चाहिये। सदा सदाचारतत्पर रहना चाहिये। कामाचारी नहीं होना चाहिये। दोनों लोकोंमें शुभ चाहनेवाला व्यक्ति कामाचारपूर्वक जीवनयापन न करनेसे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। रात्रिमें चतुष्पद (चौराहा), श्मशान, ग्रामके समीपवर्ती पीपल आदिके वृक्ष, उपवन तथा दुष्ट स्त्रीके सानिध्यका परित्याग करे। ग्रीष्म और वर्षा-ऋतुमें छत्र धारण किये रहे। रात्रि और वनमें मौन रहे। केश, अस्थि, कण्टकयुक्त अपवित्र बलिस्थान, भस्म, भूसी तथा स्नानसे भीगी हुई पृथ्वीका दूरसे ही परित्याग करे।
ब्राह्मण, राजा, स्त्री, ज्ञानवान्, गर्भिणी स्त्री, बोझसे दवा हुआ व्यक्ति, श्रेष्ठ व्यक्ति, मूक, अन्धा, बधिर, मतवाला तथा उन्मत्त व्यक्तिको दूरसे ही मार्ग दे देना चाहिये। अन्योंके द्वारा धारण किये गये जूते, वस्त्र तथा माला नहीं धारण करना चाहिये। दूसरेकी स्त्रीके उपसेवनसे बढ़कर लोकमें अनायुष्यका अन्य कोई भी कार्य नहीं है*। स्त्रियोंसे ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये और स्त्रियोंकी रक्षा करना कर्तव्य समझना चाहिये। ईर्ष्या करनेसे आयुका ह्रास होता है, अतः ईर्ष्याका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये। मूर्ख, उन्मत्त, व्यसनी, विरूप, अहंकारी, हीनाङ्ग, अधिकाङ्ग अथवा विद्यासे हीन व्यक्तिका तिरस्कार नहीं करना चाहिये। रात्रिमें देही और सत्तूका भक्षण नहीं करना चाहिये। महाराज! आधी रातमें भोजन नहीं करना चाहिये। घुटनोंको ऊपर कर अधिक देरतक नहीं बैठना चाहिये। दूसरेके रहस्यकी बातको जाननेकी उत्सुकता तथा अभिलाषा नहीं रखनी चाहिये। पैरके ऊपर पैर रखकर नहीं बैठना चाहिये। अतिशय रक्त, चितकबरा तथा कृष्ण वस्त्रको अधिक समयतक नहीं धारण करना चाहिये और वस्त्र या अलंकारका विपर्यय भी नहीं करना
- न हीदृशमानायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते। यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ॥ (उत्तरपर्व २०५।७३)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
चाहिये। दीर्घायुकी इच्छा है तो स्त्रीको दुर्बल नहीं समझना चाहिये। दूसरेको पीड़ा नहीं देनी चाहिये और परोक्षवादी नहीं होना चाहिये। असहनशील एवं अनम्र भी न हो। अगिनेसे दग्ध अथवा परशुसे काटा गया वन अड्डुरित हो सकता है, किंतु उद्बेलित और अप्रिय वाणी बोलनेपर फिर प्रेमका संचार नहीं हो सकता। मनुष्यको चाहिये कि नास्तिक न बने, वेदों और देवताओंकी निन्दा न करे, किसीके साथ वैर न करे और न कायर ही बने। ब्राह्मणको कुत्सित वाक्य न कहे। नक्षत्रोंको नहीं दिखाना चाहिये। प्राज्ञ व्यक्तिको न्यायके अनुसार कार्य करनेवाले बलवान् शत्रुजयी राजाके यहाँ सुखपूर्वक निवास करना चाहिये। जहाँपर स्त्रियाँ मात्सर्यरहित हों, वहाँपर रहना सुखप्रद होता है। जिस राष्ट्रमें किसान कृषि-कार्यमें लगे हों, अतिशय बोलनेवाले न हों और जहाँ सभी ओषधियाँ प्राप्त हों, विद्वान् व्यक्तिको वहीं रहना चाहिये। जहाँपर लोग दूसरेको पराभूत करनेवाले और वैरकी गॉठ रखनेवाले हों, जनशून्य अथवा अधिक लोग बसते हों तथा जहाँ उत्सव आदि न होते हों—इन स्थानोंपर निवास न करे। राजन्! जहाँ ऋणदाता, वैद्य, श्रोत्रिय तथा जलपूर्ण नदी—ये चारों न हों वहाँ निवास नहीं करना चाहिये। मलिन दर्पण नहीं देखना चाहिये। महाराज! दीर्घ राज्यकी इच्छा रखनेवाले व्यक्तिको स्वर्णकारके घरका अन्न नहीं खाना चाहिये, उसपर विश्वास नहीं करना चाहिये और न उसे मित्र ही बनाना चाहिये। फूटा-टूटा बर्तन, टूटी खाट, कुत्ता तथा मुर्गा—ये चार और कटिदार वृक्ष इन्हें अपने दरवाजेपर न रखे। फूटा पात्र घरमें होनेसे कलह होता है, टूटी खाट रहनेसे भी अच्छा नहीं होता, श्वान और कुककुटवाले घरमें पितर भोजन नहीं करते और कंटकयुक्त वृक्षोंके नीचे पिशाचोंका निवास रहता है। गृहस्थ व्यक्तिको चाहिये कि सुवासिनी, गर्भवती, वृद्धा स्त्री, बालकों
तथा आतुर व्यक्तिको भोजन पहले कराये। घरके स्वामीको अन्तमें भोजन करना चाहिये। असंस्कृत अन्नका भोजन नहीं करना चाहिये। जो गौका वाहन आदिके रूपमें प्रयोग कर उससे धनार्जन करता है और फिर उस धनका उपयोग करता है, घरके बाहर उपस्थित व्यक्तिको बिना दिये हुए खाता है, वह मानो पापका ही भक्षण करता है। बलिर्वैश्वदेव कर्म करनेके बाद ही विधिपूर्वक भोजन करना चाहिये। एक वस्त्र पहनकर भोजन न करे। पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख होकर प्रसन्नतापूर्वक भोजन करना चाहिये। असंस्कृत तथा कुत्सित अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये। शिष्ट व्यक्ति तथा भूखेको भोजन करानेके बाद पवित्र पात्रोंमें क्रोधरहित (शान्त, प्रसन्नचित्त) होकर भोजन करना चाहिये। तख्तेपर रखे पात्रमें, अनुचित स्थानमें, असमयमें, अतिशय संकीर्ण स्थानमें भोजन नहीं करना चाहिये। भोजनसे पूर्व अग्राशन देकर तन्मय होकर भोजन करना चाहिये। पहले मधुर पदार्थोंको, अनन्तर लवण पदार्थ और इसके बाद कटु एवं तीक्ष्ण पदार्थोंका भोजन करे। पहले कोमल पदार्थों, बीचमें गरिष्ठ व्यञ्जनों तथा अन्तमें द्रवयुक्त व्यञ्जनोंका भोजन करनेसे मनुष्य रोगमुक्त रहते हैं। दिनमें भूजेमें, रात्रिमें दही-सत्तूमें तथा कोविदार (कचनार)-में अलक्ष्मी—दरिद्राका सदा ही निवास रहता है। वाणीका संयम कर मौन होकर अन्नकी निन्दा किये बिना प्रशस्त अन्न खाना चाहिये। पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख हो भोजन करनेके बाद भलीभाँति आचमनकर पुनः हाथका प्रक्षालन करके सावधानीसे आचमन करे और इसके बाद अपने अभीष्ट देवताका स्मरण करना चाहिये। अनन्तर इन श्लोकोंका पाठ करते हुए अपने हाथसे उदरको धीरे-धीरे सहलाये—
प्राणापानसमानानामुदानव्यानयोस्तथा । अन्नं पुष्टिकरं चास्तु ममाद्याव्याहतं सुखम्॥
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अगस्तिरगिनिर्वडवानलश्च भुक्तं प्रपन्नं जरयत्वशेषम् । सुखं च मे तत्परिणामसम्भवं यच्छत्वरोगं खलु वासुदेवः ॥ (उत्तरपर्व २०५।११५-११६)
‘प्राण, अपान, समान, उदान तथा व्यान—इन पञ्चप्राणोंको पुष्टि प्रदान करनेवाला मेरे द्वारा खाया गया अन्न मेरे लिये सुखप्रद हो। अगस्त्य, अग्नि, वडवानल मेरे द्वारा भुक्त हुए अन्न और पेय पदार्थोंको भलीभाँति पचायें तथा मुझे सुखकी प्राप्ति हो और वासुदेव मुझे रोगहीन बनायें।’
इसके बाद आलस्यरहित होकर अनायास होनेवाले कर्मोंको करे। भारत! संध्याके समय यदि कोई पथिक आ जाय तो उसका पाद्य, आसन आदिके द्वारा स्वागत करे। अनन्तर अन्न-प्रदान एवं शयनके द्वारा उसकी सेवा करे। दिनमें आये अतिथिके विमुख हो जानेपर जो पाप लगता है, उसका आठ गुना पाप सायंकालमें आये अतिथिके लौट जानेपर होता है। पूर्व और दक्षिणमें सिर कर शयन करना प्रशस्त माना गया है और इसके विपरीत सोनेसे रोग उत्पन्न होता है। ऋतुकालमें ही स्त्री-सहवास प्रशस्त माना गया है। चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या एवं पर्वके समयमें तैलाभ्यङ्ग तथा स्त्री-सम्पर्क न करे। क्षौर-कर्म, स्त्री-सहवास तथा श्मशानगमनके अनन्तर सवस्त्र स्नान करना चाहिये। गुरु, पतिव्रता, यज्ञकर्ता एवं तपस्वीकी मनोविनोदमें भी निन्दा नहीं करनी चाहिये। विद्वान् व्यक्ति को एक ही साथ अग्नि और जलको धारण नहीं करना चाहिये। गुरु और देवताकी ओर पैर नहीं फैलाना चाहिये। जलको अञ्जलिसे नहीं पीना चाहिये और अधिक वायु तथा धूपका भी सेवन नहीं करना चाहिये। दास-नौकर आदिको क्रुद्ध होकर अपशब्द न कहे। सभी बन्धुओंके प्रति मात्सर्यरहित होकर रहना चाहिये। डरे हुए व्यक्ति को आश्वासन देना चाहिये, साधुवत् रहना चाहिये। ये बातें व्यक्ति को स्वर्गरूपी
फल प्रदान करती हैं। पृथ्वीपर देखते हुए चलना चाहिये। बचे हुए जीवनमें जो अपनी आत्माको वशीभूत कर जीवन-यापन करता है, उसके धर्म, अर्थ तथा कामकी थोड़ी भी हानि नहीं होती। आक्रोश, विवाद और पिशुनता छोड़ देनी चाहिये।
सोनेके समय दूसरा वस्त्र, पूजाके समयमें दूसरा और सभामें दूसरा वस्त्र पहनना चाहिये अर्थात् अलग-अलग वस्त्र धारण करना चाहिये। पतितोंके साथ बातचीत न करे अन्यथा वह भी पतित हो जाता है। वृद्ध, ज्ञाति-बन्धु तथा मित्रके दरिद्र हो जानेपर उसको अपने साथ रखना चाहिये। इनके रहनेसे घरकी वृद्धि होती है। कबूतर, शुक्र तथा मैनाको घरमें रखना अच्छा होता है। ये तथा तिलपापन करनेवाले पापरहित होते हैं। चन्दन, वीणा, दर्पण, घी, शहद, जल तथा अग्नि इन्हें घरमें निरन्तर रखना चाहिये। राजाको चाहिये कि धनुर्वेदादि शास्त्रोंके ज्ञानमें तथा नीतिशास्त्रके ज्ञानार्जनमें सदा तत्पर रहे एवं उसे शब्दशास्त्र (व्याकरण), यज्ञशास्त्र (कर्मकाण्ड), गान्धर्वशास्त्र (संगीत), कलाशास्त्र और इतिहास-पुराण आदिका भी ज्ञान रखना चाहिये।
राजन्! मैंने ये सब सदाचारके लक्षण बतलाये। अन्य जाननेयोग्य बातोंको वृद्धोंसे जानना चाहिये। सदाचार ही सभी ऐश्वर्यका जनक है। इसके पालनसे आयुकी वृद्धि होती है। यह सभी दोषोंको दूर कर देता है। सभी आगमोंमें सदाचारको ही प्रथम स्थान प्राप्त है। सदाचारसे ज्ञानकी वृद्धि होती है। आचार परम धर्म है। आचारसे ऐश्वर्य, यश, आयु, स्वर्ग और परम मङ्गल प्राप्त होता है। महाराज! सभी वर्णोंके कल्याणकी दृष्टिसे इन सबका मैंने वर्णन किया है। अतः धर्म, अर्थ, कामरूपी फलको देनेवाले सदाचारका सावधानीके साथ सदा पालन करना चाहिये। (अध्याय २०५)
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६३८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
रोहिणीचन्द्रशयन-व्रत
महाराज युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! जिस व्रतका अनुष्ठान करनेसे मनुष्य प्रत्येक जन्ममें दीर्घायु, नीरोगता, कुलीनता और अभ्युदयसे युक्त हो, राजाके कुलमें जन्म पाता है, उस व्रतका सम्यक् प्रकारसे वर्णन कीजिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— राजन्! आपने बड़ी उत्तम बात पूछी है। अब मैं अक्षय स्वर्ग-प्राप्तिकारक परम गोपनीय रोहिणीचन्द्रशयन नामक व्रतका वर्णन कर रहा हूँ। इसमें चन्द्रमाके नामोंसे भगवान् नारायणकी प्रतिमाका पूजन करना चाहिये। जब कभी सोमवारके दिन पूर्णिमा तिथि हो अथवा पूर्णिमाको रोहिणी नक्षत्र हो, उस दिन मनुष्य प्रातः पञ्चगव्य और सरसोंके दानोंसे युक्त जलसे स्नान करे तथा विद्वान् पुरुष 'आप्यायस्वः' (यजु० १२।११२, ११४) इत्यादि मन्त्रको एक सौ आठ बार जपे। यदि शूद्र भी इस व्रतको करे तो अत्यन्त भक्तिपूर्वक 'सोमाय नमः', 'वरदाय नमः', 'विष्णवे नमः'—इन मन्त्रोंका जप करे और पाखण्डियों—विधर्मियोंसे बातचीत न करे। जप करनेके पश्चात् अपने घर आकर फल-फूल आदिके द्वारा भगवान् श्रीमधुसूदनके अङ्गोंकी पूजा करे। साथ ही चन्द्रमाके नामोंका उच्चारण करता रहे। सुगन्धित पुष्प, नैवेद्य और धूप आदिके द्वारा इन्दुपत्नी रोहिणीदेवीका भी पूजन करे।
इसके बाद रात्रिके समय भूमिपर शयन करे और सबेर उठकर स्नानके पश्चात् 'पापविनाशाय नमः' का उच्चारण करके ब्राह्मणको घृत और सुवर्णसहित जलसे भरा कलश दान करे। फिर दिनभर उपवास करनेके पश्चात् गोमूत्र पीकर मांसवर्जित एवं खारे नमकसे रहित अन्नके अट्टाईस ग्रास, दूध और घीके साथ भोजन करे। तदनन्तर दो घड़ीतक इतिहास-पुराण आदिका श्रवण करे। राजन्! चन्द्रस्वरूप भगवान् विष्णुको कदम्ब, नील कमल, केवड़ा, जातीपुष्प, कमल,
शतपत्रिका, बिना कुम्हलाये कुब्जके फूल, सिन्दुवार, चमेली, अन्यान्य श्वेत पुष्प, करवीर-पुष्प तथा चम्पा—ये फूल चढ़ाने चाहिये। उपर्युक्त फूलोंकी जातियोंमेंसे एक-एकको श्रावण आदि महीनोंमें क्रमशः अर्पण करे। जिस महीनेमें व्रत प्रारम्भ किया जाय, उस समय जो भी पुष्प सुलभ हों, उन्हींके द्वारा श्रीहरिका पूजन करना चाहिये।
इस प्रकार एक वर्षतक इस व्रतका विधिवत् अनुष्ठान करके समाप्तिके समय व्रतीको चाहिये कि वह दर्पण तथा शयनोपयोगी सामग्रियोंके साथ शय्यादान करे। रोहिणी और चन्द्रमा—दोनोंकी सुवर्णमयी मूर्ति बनवाये। उनमें चन्द्रमा छः अङ्गुलके और रोहिणी चार अङ्गुलकी होनी चाहिये। आठ मोतियोंसे युक्त तथा दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादित उन प्रतिमाओंको अक्षतसे भरे हुए काँसेके पात्रमें रखकर दुग्धपूर्ण कलशके ऊपर स्थापित कर दे तथा पूर्वोह्नके समय अगहनी चावल, ईख और फलके साथ उसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक दान कर दे। फिर जिसका मुख (शृशुन) सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों, ऐसी वस्त्र और दोहिनीके साथ दूध देनेवाली श्वेत रंगकी गौ तथा सुन्दर शङ्ख प्रस्तुत करे। फिर उत्तम गुणोंसे युक्त ब्राह्मण-दम्पतिको बुलाकर उन्हें आभूषणोंसे अलंकृत करे तथा मनमें यह भावना रखे कि ब्राह्मण-दम्पतिके रूपमें ये रोहिणीसहित चन्द्रमा ही विराजमान हैं। तत्पश्चात् इनकी इस प्रकार प्रार्थना करे— 'श्रीकृष्ण! जिस प्रकार रोहिणीदेवी चन्द्रस्वरूप आपकी शय्याको छोड़कर अन्यत्र नहीं जाती हैं, उसी तरह मेरा भी इन विभूतियोंसे कभी बिछोह न हो। चन्द्रदेव! आप ही सबको परम आनन्द और मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं। आपकी कृपासे मुझे भोग और मोक्ष—दोनों प्राप्त हों तथा आपमें मेरी सदा अनन्य भक्ति बनी रहे।' इस प्रकार विनय कर शय्या, प्रतिमा तथा धेनु आदि सब कुछ ब्राह्मणको दान कर दे।
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- उत्तरपर्व *
६३९
राजन्! जो संसारसे भयभीत होकर मोक्ष प्राप्त करना चाहता है, उसके लिये यही व्रत सर्वोत्तम है। यह रूप, आरोग्य और आयु प्रदान करनेवाला है तथा यह पितरोंको सर्वदा प्रिय है। जो पुरुष इसका अनुष्ठान करता है, वह त्रिभुवनका अधिपति होकर इक्कीस सौ कल्पोंतक चन्द्रलोकमें निवास करता है। जो स्त्री इस रोहिणीचन्द्रशयन नामक
व्रतका अनुष्ठान करती है, वह भी उसी पूर्वोक्त फलको प्राप्त करती है। साथ ही वह आवागमनसे मुक्त हो जाती है। चन्द्रमाके नाम-कीर्तनद्वारा भगवान् श्रीमधसूदनकी पूजाका यह प्रसङ्ग जो नित्य पढ़ता अथवा सुनता है, उसे भगवान् उत्तम बुद्धि प्रदान करते हैं तथा वह भगवान् श्रीविष्णुके धाममें जाकर देवसमूहके द्वारा पूजित होता है। (अध्याय २०६)
श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर-संवादका उपसंहार और भगवान्का द्वारकागमन
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! व्रत, दान और धर्मके विषयमें मैंने आपको बतलाया। चूँकि इस सम्पूर्ण संसारका मूल धर्म ही है, इसलिये आप भी धर्मपरायण हो जायें। पार्थ! जानते हुए भी मैंने काम और अर्थका प्रकाश नहीं किया, क्योंकि इसमें तो सभी लोग स्वतः प्रवृत्त होते रहते हैं, अतः इसके वर्णनकी क्या आवश्यकता। पाण्डुनन्दन! इस भविष्योत्तरमें मैंने सदाचारसम्पन्न पुरुषोंके व्रत एवं दानसमूहोंका वर्णन किया। मैंने जो इतिहास और पुराणोंमें देखा और जो वेद-वेदाङ्गसे सम्बद्ध हैं, उन सभी विषयोंको यहाँ प्रदर्शित किया। राजन्! लोक-वेदविरुद्ध विषयोंमें आस्था नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह प्रलापमात्र ही है। आपसे विशेष स्नेह होनेके कारण मैंने यह सब वर्णन किया। पार्थ! दाम्भिक और शठके सम्मुख इन विषयोंको प्रकट नहीं करना चाहिये। नास्तिक, अश्रद्धालु और कुतर्कियोंसे इसकी चर्चा नहीं करनी चाहिये। सदाचारी, जितेन्द्रिय, सत्य और पवित्रतामें रत व्यक्तियोंके सामने इसके व्याख्यानसे सुगति प्राप्त होती है। पार्थ! आप स्वयं साक्षात् धर्मस्वरूप और धर्म एवं अर्थके तत्त्वके मर्मज्ञ तथा भूत-
भविष्यके ज्ञाता हैं। आपने इसे जाननेकी इच्छा प्रकट की, अतः मैंने आपके सम्मुख धर्मके रहस्यको प्रकाशित किया। मनुष्योंको इन विषयोंपर श्रद्धा-विश्वास रखना चाहिये। अब मैं द्वारकाके लिये प्रस्थान कर रहा हूँ, पुनः आपके महोत्सव और यज्ञके अवसरपर उपस्थित रहूँगा। सब कुछ कालके अधीन है, अतः किसी तरहका संताप नहीं करना चाहिये। इतना कहकर भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्नचित्त होकर पाण्डवोंद्वारा अर्चित—सम्मानित हुए, फिर सभी मित्रों और बन्धुजनोंकी सम्मति प्राप्तकर भगवान् श्रीकृष्णने ब्राह्मणोंको प्रणामकर द्वारकाकी ओर प्रस्थान किया।
सुमन्तुमुनि बोले—महाराज शतानीक! याज्ञवल्क्यमुनिने भगवान् वसिष्ठसे जिस विषयको पूछा था और उन्होंने जो उत्तर दिया तथा भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको जो कहा गया, उस विषयको मुनिश्रेष्ठ व्यासने पूर्वमें ही रच रखा था, उसी विषयका मैंने आपसे प्रतिपादन किया। पराशरके पुत्र तथा सत्यवतीके हृदयको आनन्द देनेवाले उन व्यासदेवकी जय हो। जिनके मुखकमलसे निःसृत हुई वाणीरूपी पवित्र मधुधाराका संसार पान करता है*। (अध्याय २०७)
- जयति पराशरसुतः सत्यवतीहृदयनन्दनो व्यासः । यस्यास्यकमलगलितं वाङ्मधुपुष्पं जगत् पिबति ॥ (उत्तरपर्व २०७ । १५)
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६४०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भविष्योत्तरपर्वकी संक्षिप्त अनुक्रमणिका
इस पर्वके प्रारम्भमें महाराज युधिष्ठिरके पास महर्षि वेदव्यासके साथ अनेक ऋषियोंके आगमन, ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति, नारदको वैष्णवीमायाका दर्शन, संसारके दोषोंका वर्णन, पापोंके भेद, शुभ और अशुभ लक्षणोंका वर्णन है। शकटव्रत, तिलकव्रत, अशोक और करवीर, कोकिला, बृहत्तप, भद्रोपवास, यमद्वितीया, अशून्यशयन, कामाख्यातृतीया, मेघपाली, पञ्चाग्निसाधन, त्रिरात्रगोष्पद, हरकाली, ललिता-तृतीया, योगाख्यातृतीया, उमामहेश्वरव्रत, रम्भा-तृतीया, सौभाग्यतृतीया, आर्द्रानन्दकरीतृतीया तथा चैत्र, भाद्र और माघके तृतीयाव्रतोंका वर्णन हुआ है। फिर आनन्तर्यतृतीया, विनायक-शान्ति, सारस्वतव्रत, नागपञ्चमी, श्रीपञ्चमी, शोकप्रणाशिनीषष्ठी, फलषष्ठी, मन्दारषष्ठी, ललिताषष्ठी, कार्तिकेयषष्ठी, महत्तपससमी, विभूषाससमी, आदित्यमण्डपविधि, त्रयोदशवर्ज्यससमी, कृकवाकुप्लवङ्गससमी, उभयससमी, कल्याणससमी, शर्कराससमी, कमलाससमी, शुभाससमी, स्नपनससमी, व्रतससमी और अचलाससमी, बुधाष्टमी, जन्माष्टमी, दूर्वाष्टमी, कृष्णाष्टमी, अनघाष्टमी, अर्काष्टमी व्रतोंका वर्णन है। तदनन्तर श्रीवृक्षनवमी, ध्वजनवमी, उल्कानवमी, दशावतार, आशादशमी, रोहिणीचन्द्र, इन्द्रहरि-शम्भु-ब्रह्मा-सूर्य-अवियोगव्रत, गोवत्सद्व्रादशी, नीराजनद्व्रादशी, भीष्मपञ्चक, मल्लद्व्रादशी, भीमाद्व्रादशी, श्रवणद्व्रादशी, सम्प्रासिद्धादशी, गोविन्दद्व्रादशी, अखण्डद्व्रादशी, तिलद्व्रादशी,
सुकृतद्व्रादशी, धरणीव्रत, विशोकद्व्रादशी, विभूतिद्व्रादशी, पुष्यद्व्रादशी, श्रवणद्व्रादशी, अनङ्गद्व्रादशी, अङ्गुपादव्रत, निम्बार्क-करवीर-माहात्म्य, यमदर्शनत्रयोदशी, अनङ्गत्रयोदशी, पालीव्रत, रम्भाव्रत, आग्रेयी चतुर्दशी, अनन्तचतुर्दशी, श्रावणी, नक्तचतुर्दशी, शिवचतुर्दशी, फलत्यागचतुर्दशीव्रत तथा वैशाख, कार्तिक और माघकी पूर्णिमाके माहात्म्यका वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् कार्तिकमें कृत्तिकाके योगमें कृत्तिकाव्रत, फाल्गुन पूर्णिमामें पूर्णमनोरथव्रत, अशोकपूर्णिमाव्रत, अनन्तव्रत, साम्भरायणीव्रत, नक्षत्रपुरुषव्रत, शिवनक्षत्रपुरुषव्रत, कामदानव्रत, वृत्ताकविधि, आदित्यदिननक्तव्रत, संक्रान्तिके उद्यापनका विधान, भद्राव्रत, अगस्त्यार्घ्यव्रत, नवचन्द्रार्घ्य, शुक्र-बृहस्पति-अर्घ्य-प्रदानव्रत, पञ्चाशीतिव्रत, माघस्नान, नित्यस्नान, रुद्रस्नानकी विधि, चन्द्र और सूर्य-ग्रहणमें स्नान, भोजन-विधि, वापी, कूप तथा तडागका उत्सर्ग, वृक्ष-पूजा, देवपूजा, दीपदान, वृषोत्सर्गविधि, फाल्गुनी-उत्सव, मदनोत्सव, भूतमातोत्सव, श्रावणीमें रक्षाबन्धनकी विधि, चन्द्रोत्सव, दीपमालिका, होम, लक्षहोम, कोटिहोमकी विधि, महाशान्ति तथा विनायक-शान्ति, नक्षत्रहोम, गोदान-विधि, गुडधेनु, घृतधेनु, तिलधेनु, जलधेनु, लवणधेनु और नवनीतधेनु एवं सुवर्णधेनुदानके विधानोंका निरूपण हुआ है। ये सभी देवकार्य हैं, कल्याणकामी पुरुषोंको इन धर्मकार्योंको यथाशक्ति अवश्य करना चाहिये। (अध्याय २०८)
॥ भविष्यपुराणान्तर्गत उत्तरपर्व सम्पूर्ण ॥
॥ श्रीभविष्यमहापुराण सम्पूर्ण ॥
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पञ्जीकृत संख्या — जी० आर० — १३
पौ० गीताप्रेस — २७३००५
गोरखपुर, फोन (०५५१) २३३४७२१
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गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण, उपनिषद् आदि
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28 श्रीमद्भागवत-सुधासागर
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1490 श्रीमद्भागवत-सुधासागर (विशिष्ट संस्करण)
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25 श्रीशुकसुधासागर—बृहदाकार, बड़े टाइपमें
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1535 श्रीमद्भागवत-महापुराण—
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1536 सटीक, दो खण्डोंमें सेट, (विशिष्ट संस्करण)
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26 श्रीमद्भागवत-महापुराण—
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27 सटीक, दो खण्डोंमें सेट
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29 श्रीमद्भागवत-महापुराण—मूल टाइपमें
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124 श्रीमद्भागवत-महापुराण—मूल टाइपमें
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1092 भागवत-महापुराण—मूल टाइपमें
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571 श्रीकृष्णमहाभक्तचिन्तन
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30 श्रीप्रेम-सुधासागर
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31 भागवत एकादश स्कन्ध
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728 महाभारत—हिन्दी टीका-सहित, सजिल्द, सचित्र [छः खण्डोंमें] सेट (अलग-अलग खण्ड भी उपलब्ध)
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38 महाभारत-खिलभाग हरिवंशपुराण—सटीक
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1589 ,, केवल हिन्दी
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637 जैमिनीयाश्वमेध पर्व
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39 संक्षिप्त महाभारत—केवल
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511 भाषा, सचित्र, सजिल्द सेट (दो खण्डोंमें)
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44 संक्षिप्त पद्मपुराण—सचित्र, सजिल्द
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1468 सं० शिवपुराण (विशिष्ट संस्करण)
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789 सं० शिवपुराण—मोटा टाइप
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1133 सं० देवीभागवत
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48 श्रीविष्णुपुराण—सटीक, सचित्र
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1364 श्रीविष्णुपुराण (केवल हिन्दी)
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1183 सं० नारदपुराण
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279 सं० स्कन्दपुराणांक
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539 सं० मार्कण्डेयपुराण
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1111 सं० ब्रह्मपुराण
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1113 नरसिंहपुराणम्—सटीक
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1189 सं० गरुडपुराण
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1362 अग्निपुराण (मूल संस्कृतका हिन्दी-अनुवाद)
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1361 सं० श्रीवराहपुराण
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584 सं० भविष्यपुराण
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1131 कूर्मपुराण—सटीक
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631 सं० ब्रह्मवैवर्तपुराण
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1432 श्रीवामन पुराण—सटीक
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557 मत्स्यमहापुराण—सटीक
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1610 देवीपुराण (महाभागवत) शक्तिपीठांक
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517 गर्गसंहिता
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47 पातंजलयोग-प्रदीप
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135 पातंजलयोगदर्शन
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582 छान्दोग्योपनिषद्—सानुवाद शांकरभाष्य
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577 बृहदारण्यकोपनिषद्—सानुवाद शांकरभाष्य
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1421 ईशादि नौ उपनिषद्—सानुवाद शांकरभाष्य
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66 ईशादि नौ उपनिषद्—अन्वय-हिन्दी व्याख्या
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67 ईशावास्योपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
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68 केनोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
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578 कठोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
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69 माण्डूक्योपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
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513 मुण्डकोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
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70 प्रश्नोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
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71 तैत्तिरीयोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
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72 ऐतरेयोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
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73 श्वेताश्वतरोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
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65 वेदान्त-दर्शन—हिन्दी व्याख्या-सहित, सजिल्द
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639 श्रीनारायणीयम्—सानुवाद
गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५ फोन : (०५५१) २३३४७२१, २३३१२५०, २३३१२५१
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