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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 630, कुल 654 में से

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  • उत्तरपर्व *

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कन्द, मूल, फल आदि देनेसे पितर संतुष्ट हो जाते हैं और उसे उत्तम गति मिलती है। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रमें कुलीन और वेदवेत्ता ब्राह्मणको दधिपात्र देनेसे पुत्र, पौत्र, धन, धान्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है तथा उत्तम कुलमें जन्म होता है। उत्तराषाढ़ा नक्षत्रमें उदमंथ (जौकी माड़ी), घी, मधु और फाणित (राब) ब्राह्मणको देनेसे सभी कामनाओंकी प्राप्ति होती है। अभिजित् नक्षत्रमें घी, मधु तथा दुग्ध देनेसे स्वर्गमें निवास होता है।

श्रवण नक्षत्रमें पुस्तक-दान करनेसे विमानमें बैठकर इच्छानुसार सभी लोकोंमें विचरण करनेका अवसर प्राप्त होता है। धनिष्ठा नक्षत्रमें दो गायोंका दान करनेसे अनेक जन्मोंतक सुखकी प्राप्ति होती है। शतभिषा नक्षत्रमें अगरू और चन्दनका जो व्यक्ति दान करता है वह सुन्दर अप्सराओंके लोकमें जाता है। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रमें राजमाष (बड़े उड़द)-का दान देनेसे सभी प्रकारके भक्ष्य-भोज्य प्राप्त होते हैं और जन्मान्तरमें सुखकी प्राप्ति होती है। उत्तराभाद्रपद नक्षत्रमें

सुन्दर वस्त्रोंका दान करनेसे पितर संतुष्ट होते हैं और उसे सद्गति प्राप्त होती है।

रेवती नक्षत्रमें कांस्यके दोहन-पात्रसहित ब्राह्मणको गोदान करनेसे सभी मनोरथोंकी सिद्धि होती है और जन्मान्तरमें सद्गति प्राप्त होती है। अश्विनी नक्षत्रमें उत्तम अश्लोक युक्त रथ ब्राह्मणको दान देनेसे राजवैभव-सम्पन्न कुटुम्बमें जन्म होता है और इस दानको करनेवाला व्यक्ति तेजस्वी होता है। भरणी नक्षत्रमें ब्राह्मणको तिलधेनुका दान करनेसे उसे उत्तम गौएँ तथा यश और सद्गतिकी प्राप्ति होती है।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! नारदजीने इस नक्षत्रकल्पको माता देवकीसे कहा था। यह नक्षत्र-दानकी विधि मैंने आपको सुनायी। इस दानके करनेसे सभी तरहके पाप दूर हो जाते हैं और सभी उपद्रव शान्त हो जाते हैं। इस दानमें किसी समय, दिन और कालका कोई विशेष नियम नहीं है, बल्कि इसमें श्रद्धा और विश्वास ही मुख्य है। (अध्याय १९२)

तिथिदान (तिथियोंमें दानके पदार्थ)

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं सभी पापोंका विनाश करनेवाले और विघ्नोंको हरनेवाले तिथिदान (तिथियोंमें दिये जानेवाले दान-पदार्थ)-का विधान बता रहा हूँ। इस दानके करनेसे कायिक, वाचिक और मानसिक पाप उसी क्षण कट जाते हैं। श्रावण, कार्तिक, चैत्र, वैशाख अथवा फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदा तिथिसे यह पुण्यवर्धक दान प्रारम्भ करना चाहिये। धन, श्रद्धा, सहयोगी और सत्पात्र—ये सब मिल जायें तो वही उत्तम दानका समय है। तीर्थ, देवालय, गोष्ठ अथवा घरमें ही श्रद्धापूर्वक दान देनेसे अनन्त फल प्राप्त होता है।

प्रतिपदाके दिन एक सुवर्णमय अष्टदल कमल बनाकर उसपर सुवर्णमय ब्रह्माकी स्थापना करे। इस कमलको सुगन्धित घृतसे पूर्ण औदुम्बरके पात्रमें रखकर पुष्प, धूप आदिसे ब्रह्माकी पूजा करे और ब्राह्मणकी पूजा कर उसे वह प्रतिमा दानमें दे दे। दाता इससे अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त करता है और निष्कामभावसे यह दान करनेपर तो ब्रह्मीभूत हो जाता है। द्वितीयाके दिन सुवर्णकी अग्निकी प्रतिमा बनाये, उसे गुड़ तथा घृतसे पूरित ताम्रपात्रमें रखे और उस पात्रको जलपूर्ण कलशके ऊपर स्थापित करे, फिर व्याहतिथीसे घृत और तिलोंसे एक सौ आहुति

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