भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
रहा हो तो रुदन, हर्षित है तो हर्ष, दुःखी है तो दुःख, सुखी है तो सुख, भोगसे भोग, स्वस्थतासे स्वस्थता तथा दीन रहनेसे दीनताकी प्राप्ति होती है१। इसलिये इस तिथिको हष्ट और प्रसन्न रहना चाहिये। यह तिथि वैष्णवी भी है, दानवी भी है
और पैत्रिकी भी है। दीपमालाके दिन जो व्यक्ति भक्तिसे राजा बलिका पूजन-अर्चन करता है, वह वर्षभर आनन्दपूर्वक सुखसे व्यतीत करता है और उसके सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।
(अध्याय १४०)
शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मों तथा नवग्रह-शान्तिकी विधिका वर्णन२
युधिष्ठिरे कहा—भगवन्! आप सर्वज्ञ हैं, इसलिये आप यह बतलानेकी कृपा करें कि सम्पूर्ण कामनाओंकी अविचल सिद्धिके लिये शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मोंका अनुष्ठान किस प्रकार करना चाहिये?
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! लक्ष्मीकी कामनावाले अथवा शान्तिके अभिलाषी तथा वृष्टि, दीर्घायु और पुष्टिकी इच्छासे युक्त मनुष्यको ग्रहयज्ञका समारम्भ करना चाहिये। मैं सम्पूर्ण शास्त्रोंका अवलोकन करनेके पश्चात् पुराणों एवं श्रुतियोंद्वारा आदिष्ट इस ग्रहशान्तिका संक्षिप्त वर्णन कर रहा हूँ। इसके लिये ज्योतिषीद्वारा बतलाये गये शुभ मुहूर्तमें ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर ग्रहों एवं ग्रहाधिदेवोंकी स्थापना करके हवन प्रारम्भ करना चाहिये। पुराणों एवं श्रुतियोंके ज्ञाता विद्वानोंने तीन प्रकारके ग्रहयज्ञ बतलाये हैं। पहला दस हजार आहुतियोंका अयुतहोम, उससे बढ़कर दूसरा एक लाख आहुतियोंका लक्षहोम तथा सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला तीसरा एक करोड़ आहुतियोंका कोटिहोम होता है। दस हजार आहुतियोंवाला ग्रहयज्ञ नवग्रहयज्ञ कहलाता है। इसकी विधि जो पुराणों एवं श्रुतियोंमें बतलायी गयी है, प्रथम मैं उसका वर्णन कर रहा हूँ। (यजमान मण्डपनिर्माणके बाद)
हवनकुण्डकी पूर्वोत्तर-दिशामें स्थापनाके लिये एक वेदीका निर्माण कराये, जो दो बीता लम्बी-चौड़ी, एक बीता ऊँची, दो परिधियोंसे सुशोभित और चौकोर हो। उसका मुख उत्तरकी ओर हो। पुनः कुण्डमें अग्निकी स्थापना करके उस वेदीपर देवताओंका आवाहन करे। इस प्रकार उसपर बत्तीस देवताओंकी स्थापना करनी चाहिये।
सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु—ये लोगोंके हितकारी ग्रह कहे गये हैं। इन ग्रहोंकी प्रतिमा क्रमशः ताँबा, स्फटिक, रक्त चन्दन, स्वर्ण, चाँदी तथा लोहेसे बनानी चाहिये। श्वेत चावलोंद्वारा वेदीके मध्यमें सूर्यकी, दक्षिणमें मंगलकी, उत्तरमें बृहस्पतिकी, पूर्वोत्तरकोणपर बुधकी, पूर्वमें शुक्रकी, दक्षिण-पूर्वकोणपर चन्द्रमाकी, पश्चिममें शनिकी, पश्चिम-दक्षिणकोणपर राहुकी और पश्चिमोत्तरकोणपर केतुकी स्थापना करनी चाहिये। इन सभी ग्रहोंमें सूर्यके शिव, चन्द्रमाके पार्वती, मंगलके स्कन्द, बुधके भगवान् विष्णु, बृहस्पतिके ब्रह्मा, शुक्रके इन्द्र, शनैश्चरके यम, राहुके काल और केतुके चित्रगुप्त अधिदेवता माने गये हैं। अग्नि, जल, पृथ्वी, विष्णु, इन्द्र, सौवर्ण देवता, प्रजापति, सर्प और ब्रह्मा—ये सभी क्रमशः
१-यो यादृशेन भावेन तिष्ठत्यस्यांयुधिष्ठिर। हर्षदेन्यादिरूपेण तस्य वर्षं प्रयाति हि॥
रुदिते रोदिति वर्षं दृष्टो वर्षप्रह्व्यति। भुक्ता भोक्ता भवेद्वर्षस्वस्थः स्वस्थो भवेदिति॥ (उत्तरपर्व १४०। ६८-६९)
२-यह पाँच आथर्वण कल्पों—नक्षत्र, वैतान, संहिताविधि, अङ्गिरस एवं शान्तिकल्पमेंसे प्रथम एवं पाँचवें शान्तिकल्पका समन्वित रूप है और अथर्वपरिशिष्ट, याज्ञवल्क्यस्मृति १। २९५—३०८, वृद्धपाशर ११, पद्मपुराण, सुष्टिखण्ड ८२—८६, नारदपुराण १। ५१, मत्स्यपुराण, अग्निपुराण २६४—२७४ आदिमें भी प्राप्त है।
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