भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 564, कुल 654 में से
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प्रत्यधिदेवता हैं। इनके अतिरिक्त विनायक, दुर्गा, वायु, आकाश, सावित्री, लक्ष्मी तथा उमाको उनके पतिदेवताओंके साथ और अश्विनीकुमारोंका भी व्याहितियोंके उच्चारणपूर्वक आवाहन करना चाहिये। उस समय मंगलसहित सूर्यको लाल वर्णका, चन्द्रमा और शुक्रको श्वेत वर्णका, बुध और बृहस्पतिको पीत वर्णका, शनि और राहुको कृष्ण वर्णका तथा केतुको धूम्र वर्णका जानना और ध्यान करना चाहिये। बुद्धिमान् यज्ञकर्ता जो ग्रह जिस रंगका हो, उसे उसी रंगका वस्त्र और फूल समर्पित करे, सुगन्धित धूप दे। पुनः फल, पुष्प आदिके साथ सूर्यको गुड़ और चावलसे बने हुए अन्न (खीर)-का, चन्द्रमाको घी और दूधसे बने हुए पदार्थका, मंगलको गोड़ियाका, बुधको क्षीरषष्ठिक (दूधमें पके हुए साठीके चावल)-का, बृहस्पतिको दही-भातका, शुक्रको घी-भातका, शनैश्चरको खिचड़ीका, राहुको अजशृंगी नामक लताके फलके गूदाका और केतुको विचित्र रंगवाले भातका नैवेद्य अर्पण करके सभी प्रकारके भक्ष्य पदार्थोंद्वारा पूजन करे।
वेदीके पूर्वोत्तरकोणपर एक छिद्ररहित कलशकी स्थापना करे, उसे दही और अक्षतसे सुशोभित, आप्रके पल्लवसे आच्छादित और दो वस्त्रोंसे परिवेष्टित करके उसके निकट फल रख दे। उसमें पञ्चरत्न डाल दे और उसे पञ्चभङ्ग (पीपल, बरगद, पाकड़, गूलर और आमके पल्लव)-से युक्त कर दे। उसपर वरुण, गङ्गा आदि नदियों, सभी समुद्रों और सरोवरोंका आवाहन तथा स्थापन करे। राजेन्द्र! धर्मज्ञ पुरोहितको चाहिये कि वह हाथीसार, घुड़शाल, चौराहे, बिमवट, नदीके संगम, कुण्ड और गोशालाकी मिट्टी लाकर उसे सर्वौषधमिश्रित जलसे अभिषिक्त कर यजमानके स्नानके लिये वहाँ प्रस्तुत कर दे तथा 'यजमानके पापको नष्ट करनेवाले सभी समुद्र, नदी, नद, बादल और सरोवर यहाँ पथारें' ऐसा
कहकर इन देवताओंका आवाहन करे। तत्पश्चात् घी, जौ, चावल, तिल आदिसे हवन प्रारम्भ करे। मदार, पलाश, खैर, चिचड़ा, पीपल, गूलर, शमी, दूब और कुश—ये क्रमशः नवों ग्रहोंकी समिधाएँ हैं। इनमें प्रत्येक ग्रहके लिये मधु, घी और दही अथवा पायससे युक्त एक सौ आठ या अट्ठाईस आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको सदा सभी कर्मोंमें अँगूठेके सिरसे तर्जनीके सिरेतककी मापवाली तथा बरौह, शाखा और पतोंसे रहित समिधाओंकी कल्पना करनी चाहिये। परमार्थवेत्ता यजमान सभी देवताओंके लिये उन-उनके पृथक्-पृथक् मन्त्रोंका मन्द स्वरसे उच्चारण करते हुए समिधाओंका हवन करे। अनन्तर प्रत्येक देवताके लिये उसके मन्त्रद्वारा हवन करना चाहिये। ब्राह्मणको 'आ कृष्णेन रजसा०' (यजु० ३३।४३) इस मन्त्रका उच्चारण कर सूर्यको आहुति देनी चाहिये। पुनः 'इमं देवा०' (यजु० ९।४०) इस मन्त्रसे चन्द्रमाको आहुति दे। मंगलके लिये 'अग्निर्मूर्धा०' (यजु० १३।१४) इस मन्त्रसे आहुति दे। बुधके लिये 'उदबुध्यस्व०' (यजु० १५।५४) और देवगुरु बृहस्पतिके लिये 'बृहस्पते अति०' (यजु० २६।३) ये मन्त्र माने गये हैं। शुक्रके लिये 'अन्नात्यरि०' (यजु० १९।७५) और शनैश्चरके लिये 'शं नो देवीरभिष्ट्य०' (यजु० ३६।१२) इस मन्त्रसे आहुति दे। राहुके लिये 'कथा नश्चित्र०' (यजु० २७।३९) यह मन्त्र कहा गया है तथा केतुकी शान्तिके लिये 'केतुं कृण्वन्०' (यजु० २९।३७) इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। चरु आदि हवनीय पदार्थोंमें घी मिलाकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये, तत्पश्चात् व्याहितियोंका उच्चारण करके घीकी दस आहुतियाँ अग्निमें डाले। पुनः श्रेष्ठ ब्राह्मण उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख बैठकर प्रत्येक देवताके मन्त्रोच्चारणपूर्वक चरु आदि पदार्थोंका हवन करे।
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