भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 565, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
फिर 'आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं०' (ऋ० ४।३।१, कृष्णयजु० तै० सं० १।३।१४।१) इस मन्त्रका उच्चारण कर रुद्रके लिये हवन और बलि देनी चाहिये। तत्पश्चात् उमाके लिये 'आपो हि घ्ना०' (वाजस० सं० ११।५०) इस मन्त्रसे, स्वामिकार्तिकेयके लिये 'स्यो ना०' इस मन्त्रसे, विष्णुके लिये 'इदं विष्णुर्वि०' (यजु० ५।१५) इस मन्त्रसे, ब्रह्माके लिये 'तमीशानम्०' (वाजस० २५।१८) इस मन्त्रसे और इन्द्रके लिये 'इन्द्रभिहेवताय०' इस मन्त्रसे आहुति डाले। इसी प्रकार यमके लिये 'आयं गौः०' (यजु० ३।६) इस मन्त्रसे हवन बतलाया गया है। कालके लिये 'ब्रह्मजज्ञानम्०' (यजु० १३।३) यह मन्त्र प्रशस्त माना गया है। अग्निके लिये 'अग्निं दूतं वृणीमहे०' (ऋक्स० १।१२।१) यह मन्त्र बतलाया गया है। वरुणके लिये 'उदुत्तमं वरुणपाशम्०' (ऋक्स० १।२४।१५) यह मन्त्र कहा गया है। वेदोंमें पृथ्वीके लिये 'पृथिव्यन्तरिक्षम्०' इस मन्त्रका पाठ है। विष्णुके लिये 'सहस्रशीर्षा पुरुषः०' (वाजस० सं० ३१।१) यह मन्त्र कहा गया है।
हवन समाप्त हो जानेपर चार ब्राह्मण अभिषेक-मन्त्रोंद्वारा उसी जलपूर्ण कलशसे पूर्व अथवा उत्तर मुख करके बैठे हुए यजमानका अभिषेक करें और ऐसा कहें—'ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर—ये देवता आपका अभिषेक करें। जगदीश्वर वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्ण, सामर्थ्यशाली संकर्षण (बलराम), प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये सभी आपको विजय प्रदान करें। इन्द्र, अग्नि, ऐश्वर्यशाली यम, निर्ऋति, वरुण, पवन, कुबेर, ब्रह्मासहित शिव, शेषनाग और दिव्यालगण—ये सभी आपकी रक्षा करें। कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, मति, बुद्धि, लज्जा, शान्ति, पुष्टि, कान्ति तथा तुष्टि—ये सभी माताएँ जो धर्मकी पत्नियाँ हैं,
आकर आपको अभिषिक्त करें। सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतु—ये सभी ग्रह प्रसन्नतापूर्वक आपको अभिषिक्त करें। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, ऋषि, गौ, देवमाताएँ, देवपत्नियाँ, वृक्ष, नाग, दैत्य, अप्सराओंके समूह, अस्त्र, सभी शस्त्र, नृपगण, वाहन, औषध, रत्न, (कला, काष्ठ आदि) कालके अवयव, नदियाँ, सागर, पर्वत, तीर्थस्थान, बादल तथा नद—ये सभी सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये आपको अभिषिक्त करें।'
इस प्रकार श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा सर्वौषधि एवं सम्पूर्ण सुगन्धित पदार्थोंसे युक्त जलसे स्नान करा दिये जानेके पश्चात् सपत्नीक यजमान श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत चन्दनका अनुलेप करे और विस्मयरहित होकर शान्त चित्तवाले ऋत्विजोंका प्रयत्नपूर्वक दक्षिणा आदि देकर पूजन करे तथा सूर्यके लिये कपिला गौका, चन्द्रमाके लिये शङ्खुका, मंगलके लिये भार वहन करनेमें समर्थ एवं ऊँचे डीलवाले लाल रंगके बैलका, बुधके लिये सुवर्णका, बृहस्पतिके लिये एक जोड़ा पीले वस्त्रका, शुक्रके लिये श्वेत रंगके घोड़ेका, शनैश्चरके लिये काली गौका, राहुके लिये लोहेकी बनी हुई वस्तुका और केतुके लिये उत्तम बकरेके दानका विधान है। यजमानको ये सारी दक्षिणाएँ सुवर्णके साथ अथवा स्वर्णनिर्मित मूर्तिके रूपमें देनी चाहिये या जिस प्रकार गुरु (पुरोहित) प्रसन्न हों, उनके आज्ञानुसार सभी ब्राह्मणोंको सुवर्णसे अलंकृत गौएँ अथवा केवल सुवर्ण दान करना चाहिये। पर सर्वत्र मन्त्रोच्चारणपूर्वक ही इन सभी दक्षिणाओंके देनेका विधान है।
दान देते समय सभी देय वस्तुओंसे पृथक्-पृथक् इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—'कपिले! तुम रोहिणीरूप हो, तीर्थ एवं देवता तुम्हारे स्वरूप
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