भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 562, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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चाहिये। राजकर्मचारी भी हाथमें प्रज्वलित दीपक लिये रहें। पूरे नगरकी रमणीयता देखकर राजाको यह मानना चाहिये कि राजा बलि मेरे ऊपर आज प्रसन्न हो गये होंगे। फिर राजा अपने महलमें वापस आ जाय।
आधी रात बीत जानेपर जब सब लोग निद्रामें हों, उस समय घरकी स्त्रियोंको चाहिये कि वे सूप बजाते हुए घरभरमें घूमती हुई आँगनतक आयें और इस प्रकार वे दरिद्रा—अलक्ष्मीका अपने घरसे निस्सारण करें। प्रातःकाल होते ही राजाको चाहिये कि वस्त्र, आभूषण आदि देकर ब्राह्मणों, सत्पुरुषोंको संतुष्ट करे और भोजन, ताम्बूल देकर मधुर वचनोंसे पण्डितोंका सत्कार करे तथा सामन्त, सिपाही और सेवक आदिको आभूषण, धन आदि देकर संतुष्ट करे तथा अनेक प्रकारके मल्लक्रीडा आदिका आयोजन करे। राजाको मध्याह्नके अनन्तर नगरके पूर्व दिशामें ऊँचे स्तम्भ अथवा वृक्षोंपर कुश और काशकी बनी मार्गपाली१ बाँधकर उसकी पूजा करे। फिर हवन करे। अपनी प्रजाको भोजन देकर संतुष्ट करे। उस समय राजाको मार्गपालीकी आरती करनी चाहिये, यह आरती विजय प्रदान करती है। उसके बाद गाय, बैल, हाथी, घोड़ा, राजा, राजपुत्र, ब्राह्मण, शूद्र आदि सभी लोगोंको उस मार्गपालीके नीचेसे निकलना चाहिये। मार्गपालीको बाँधनेवाला अपने दोनों कुलोंका उद्धार करता है। इसका लङ्घन करनेवाले वर्षभर सुखी और नीरोग रहते हैं। फिर भूमिपर पाँच रंगोंसे मण्डल लिखकर उसके मध्यमें प्रसन्नमुख, द्विभुज, कुण्डल धारण करनेवाले कृष्णाण्ड, बाण तथा मुर आदि दानवोंके साथ
सर्वाभरणभूषित रानी विन्ध्यावलीसहित राजा बलिकी मूर्तिकी स्थापना करे और कमल, कुमुद, कह्हार, रक्त कमल आदि पुष्पों तथा गन्ध, दीप, नैवेद्य, अक्षत और दीपकों तथा अनेक उपहारोंसे राजा बलिकी पूजा कर इस प्रकार प्रार्थना करे—
बलिराज नमस्तुभ्यं विरोचनसुत प्रभो। भविष्येन्द्रसुरागते पूजेयं प्रतिगृह्यताम्॥
(उत्तरपर्व १४०।५४)
इस प्रकार पूजन कर रात्रिको जागरणपूर्वक महोत्सव करना चाहिये। नगरके लोग अपने-अपने घरमें शय्यामें श्वेत तण्डुल बाँधकर राजा बलिको उसमें स्थापितकर फल-पुष्पादिसे पूजन करें और बलिके उद्देश्यसे दान करें, क्योंकि राजा बलिके लिये जो व्यक्ति दान देता है, उसका दिया हुआ दान अक्षय हो जाता है। भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर बलिले पृथ्वीको प्राप्त किया और यह कार्तिकी अमावास्या तिथि राजा बलिको प्रदान की, उसी दिनसे यह कौमुदीका उत्सव प्रवृत्त हुआ है२। यह तिथि सभी उपद्रव, सभी प्रकारके विघ्न, शोक आदिको दूर करनेवाली है। धन, पुष्टि, सुख आदि प्रदान करती है। 'कु' यह पृथ्वीका वाचक शब्द है और 'मुदी' का अर्थ होता है प्रसन्नता। इसलिये पृथ्वीपर सबको हर्ष देनेके कारण इसका नाम कौमुदी पड़ा। जो राजा वर्षभरमें एक दिन राजा बलिका उत्सव करता है, उसके राज्यमें रोग, शत्रु, महामारी और दुर्भिक्षका भय नहीं होता। सुभिक्ष, आरोग्य और सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। इस कौमुदी तिथिको जो व्यक्ति जिस भावमें रहता है, उसे वर्षभर उसी भावकी प्राप्ति होती है। यदि व्यक्ति उस दिन रुदन कर
१-मार्गपाली दरवाजेके पास बना हुआ स्वागतद्वार है, जो कुश, काश, तृण आदि और आम्र तथा अशोकके पत्तेसे अलंकृत कर बनायी जाती है।
२-विष्णुना वसुधा लब्धा प्रीतेन बलये पुनः। उपकारपरो दत्तश्चासुराणां महोत्सवः ॥
ततः प्रभृति राजेन्द्र प्रवृत्ता कौमुदी पुनः। (उत्तरपर्व १४०।५९-६०)
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