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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 561, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अनेक प्रकारके ईति-भीति आदि दुयोंगों, कष्टोंका भय नहीं रहता तथा राजा शत्रुओंको पराजित कर

चिर कालतक राज्यसुख भोगकर अन्त समयमें इन्द्रलोकको प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १३९)

दीपमालिकोत्सव

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने वामनरूप धारणकर दानवराज बलिको छलकर इन्द्रको राज्यका भार सौंप दिया और राजा बलिको पाताललोकमें स्थापित कर दिया। भगवान्ने बलिके यहाँ सदा रहना स्वीकार किया। कार्तिककी अमावास्याको रात्रिमें सारी पृथ्वीपर दैत्योंकी यथेष्ट चेष्टाएँ होती हैं।

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! कौमुदीतिथिकी विधिको विशेषरूपसे बतानेकी कृपा करें। उस दिन किस वस्तुका दान किया जाता है। किस देवताकी पूजा की जाती है तथा कौन-सी क्रीडा करनी चाहिये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! कार्तिक मासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशीको प्रभातके समय नरकके भयको दूर करनेके लिये स्नान अवश्य करना चाहिये। अपामार्ग (चिचड़ा)-के पत्र सिरके ऊपर मन्त्र पढ़ते हुए घुमाये*। इसके बाद धर्मराजके नामों—यम, धर्मराज, मृत्यु, वैवस्वत, अन्तक, काल तथा सर्वभूतक्षयका उच्चारण कर तर्पण करे। देवताओंकी पूजा करनेके बाद नरकसे बचनेके उद्देश्यसे दीप जलाये। प्रदोषके समय शिव, विष्णु, ब्रह्मा आदिके मन्दिरोंमें, कोष्ठगार, चैत्य, सभामण्डप, नदीतट, महल, तडाग, उद्यान, वापी, मार्ग, हस्तिशाला तथा अश्वशाला आदि स्थानोंमें दीप प्रज्वलित करने चाहिये।

अमावास्याके दिन प्रातःकाल स्नानकर देवता

और पितरोंका भक्तिपूर्वक पूजन-तर्पण आदि करे तथा पार्वण-श्राद्ध करे। अनन्तर ब्राह्मणको दूध, दही, घृत और अनेक प्रकारके स्वादिष्ट भोजन करकर दक्षिणा प्रदान करे और उन्हें संतुष्ट करे। अपराह्कालमें राजाद्वारा अपने राज्यमें यह घोषित कराना चाहिये कि 'आज इस लोकमें बलिका शासन है। नगरके सभी लोगोंको अपनी सामर्थ्यके अनुसार अपने घरको स्वच्छ—साफ-सुथरा करके नाना प्रकारके रंग-बिरंगे तोरण-पताकाओं, पुष्पमालाओं तथा बंदनवारोंसे सजाना चाहिये। नगरके सभी लोगों अर्थात् नर-नारी, बाल-वृद्ध आदिको चाहिये कि सुन्दर उत्तम वस्त्र पहनकर कुंकुम, चन्दन आदिका लेप लगाकर ताम्बूलका भक्षण करते हुए आनन्दपूर्वक नृत्य-गीतादिकोंका आयोजन करें।' इस प्रकार अतीव उल्लाससे एवं प्रीतिपूर्वक इस दिन दीपोत्सव मनाना चाहिये। प्रदोषके समय दीपमाला प्रज्वलित कर अनेक प्रकारके दीप-वृक्ष खड़े करने चाहिये। उस समय राक्षस लोकमें विचरण करते हैं। उनके भयको दूर करनेके लिये श्रेष्ठ कन्याओंको दीप-वृक्षोंपर तण्डुल (धानका लावा) फेंकते हुए दीपकोसे नीराजन करना चाहिये। दीपमालाओंके जलानेसे प्रदोष-वेला दोषरहित हो जाती है और राक्षसादिका भय दूर हो जाता है। इस प्रकार अति शोभासम्पन्न नगरकी शोभा देखनेके उद्देश्यसे राजाको अपने मित्र, मन्त्री आदिके साथ अर्धरात्रिके समय धीरे-धीरे पैदल ही चलना

  • मन्त्र इस प्रकार हैं—

हर पापमपामार्ग भ्राग्यमाणं पुनः पुनः ।

आपदं किल्विषं चापि ममापहर सर्वशः । अपामार्गं नमस्तेऽस्तु शरीरं मम शोधय ॥ (उत्तरपर्व १४०।९)

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