भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भूतमाताका विशेष उत्सव मनाना चाहिये। इस प्रकार अनेक प्रकारके उत्सवोंसे भूतमाताका पूजन करनेवाले व्यक्ति सपरिवार प्रसन्न रहते हैं और
उनके घरमें किसी प्रकारके विघ्न उत्पन्न नहीं होते। ये भूतमाता भगवती पार्वतीके अंशसे समुद्धृत हैं। (अध्याय १३३-१३६)
श्रावणपूर्णिमाको रक्षाबन्धनकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! प्राचीन कालमें देवासुर-संग्राममें देवताओंद्वारा दानव पराजित हो गये। दुःखी होकर वे दैत्यराज बलिके साथ गुरु शुक्राचार्यजीके पास गये और अपनी पराजयका वृत्तान्त बतलाया। इसपर शुक्राचार्य बोले—‘दैत्यराज! आपको विषाद नहीं करना चाहिये। दैववश कालकी गतिसे जय-पराजय तो होती ही रहती है। इस समय वर्षभरके लिये तुम देवराज इन्द्रके साथ संधि कर लो, क्योंकि इन्द्र-पत्नी शचीने इन्द्रको रक्षा-सूत्र बाँधकर अजेय बना दिया है। उसीके प्रभावसे दानवेन्द्र! तुम इन्द्रसे परास्त हुए हो। एक वर्षतक प्रतीक्षा करो, उसके बाद तुम्हारा कल्याण होगा। अपने गुरु शुक्राचार्यके वचनोंको सुनकर सभी दानव निश्चित हो गये और समयकी प्रतीक्षा करने लगे। राजन्! यह रक्षाबन्धनका विलक्षण प्रभाव है, इससे विजय, सुख, पुत्र, आरोग्य और धन प्राप्त होता है।’
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! किस तिथिमें किस विधिसे रक्षाबन्धन करना चाहिये। इसे बतायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! श्रावण मासकी पूर्णिमाके दिन प्रातःकाल उठकर शौच इत्यादि नित्य-क्रियासे निवृत्त होकर श्रुति-स्मृति-विधिसे स्नान कर देवताओं और पितरोंका निर्मल जलसे तर्पण करना चाहिये तथा उपाकर्मविधिसे
वेदोक्त ऋषियोंका तर्पण भी करना चाहिये। ब्राह्मणवर्ग देवताओंके उद्देश्यसे श्राद्ध करें। तदनन्तर अपराह्ण-कालमें रक्षापोटलिका इस प्रकार बनाये—कपास अथवा रेशमके वस्त्रमें अक्षत, गौर सर्पप, सुवर्ण, सरसों, दूर्वा तथा चन्दन आदि पदार्थ रखकर उसे बाँधकर एक पोटलिका बना ले तथा उसे एक ताम्रपात्रमें रख ले और विधिपूर्वक उसको प्रतिष्ठित कर ले। आँगनको गोबरसे लीपकर एक चौकोर मण्डल बनाकर उसके ऊपर पीठ स्थापित करे और उसके ऊपर मन्त्रीसहित राजाको पुरोहितके साथ बैठना चाहिये। उस समय उपस्थित जन प्रसन्न-चित्त रहें। मङ्गल-ध्वनि करें। सर्वप्रथम ब्राह्मण तथा सुवासिनी स्त्रियाँ अध्यादिके द्वारा राजाकी अर्चना करें। अनन्तर पुरोहित उस प्रतिष्ठित रक्षापोटलीको इस मन्त्रका पाठ करते हुए राजाके दाहिने हाथमें बाँधें—
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
(उत्तरपर्व १३७।२०)
तत्पश्चात् राजाको चाहिये कि सुन्दर वस्त्र, भोजन और दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंकी पूजाकर उन्हें संतुष्ट करे। यह रक्षाबन्धन चारों वर्णोंको करना चाहिये। जो व्यक्ति इस विधिसे रक्षाबन्धन करता है, वह वर्षभर सुखी रहकर पुत्र-पौत्र और धनसे परिपूर्ण हो जाता है। (अध्याय १३७)
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