भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 558, कुल 654 में से
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महानवमी ( विजयादशमी )-व्रत
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! महानवमी सब तिथियोंमें श्रेष्ठ है। सभी प्रकारके मङ्गल और भगवतीकी प्रसन्नताके लिये सब लोगोंको और विशेषकर राजाओंको महानवमीका उत्सव अवश्य मनाना चाहिये।
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! इस महानवमी-व्रतका आरम्भ कबसे हुआ? क्या यशोदाके गर्भसे प्रादुर्भूत होनेके समयसे महानवमी-व्रतका प्रचलन हुआ अथवा इसके पूर्व सत्ययुग आदिमें भी यह महानवमी-व्रत था? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! वह परमशक्ति सर्वव्यापिनी, भावगम्या, अनन्ता और आद्या आदि नामसे विश्वविख्यात है। उनका काली, सर्वमङ्गला, माया, कात्यायिनी, दुर्गा, चामुण्डा तथा शंकरप्रिया आदि अनेक नाम-रूपोंसे ध्यान और पूजन किया जाता है।
देव, दानव, राक्षस, गन्धर्व, नाग, यक्ष, किन्नर, नर आदि सभी अष्टमी तथा नवमीको उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। कन्याके सूर्यमें आश्विन मासके शुक्ल पक्षमें अष्टमीको यदि मूल नक्षत्र हो तो उसका नाम महानवमी है। यह महानवमी तिथि तीनों लोकोंमें अत्यन्त दुर्लभ है। आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी और नवमीको जगन्माता भगवती श्रीअम्बिकाका पूजन करनेसे सभी शत्रुओंपर विजय प्राप्त हो जाती है। यह तिथि पुण्य, पवित्रता, धर्म और सुखको देनेवाली है। इस दिन मुण्डमालिनी चामुण्डाका पूजन अवश्य करना चाहिये। सभी कल्पों और मन्वन्तरोंमें देव, दैत्य आदि अनेक प्रकारके उपचारोंसे नवमी तिथिको भगवतीकी पूजा किया करते हैं और तीनों लोकोंमें अवतार लेकर भगवती मर्यादाका पालन करती रहती हैं।
राजन्! यही पराम्बा जगन्माता भगवती यशोदाके गर्भसे उत्पन्न हुई थीं और वे कंसके मस्तकपर पैर रखकर आकाशमें चली गयीं और फिर विन्ध्याचलमें स्थापित हुई, तभीसे यह पूजा प्रवर्तित हुई।
भगवतीका यह उत्सव पहलेसे ही प्रसिद्ध था, परंतु सभी प्राणियोंके उपकारके लिये तथा सभी विघ्न-बाधाओंकी शान्तिके लिये ही मैंने अपनी बहनके रूपमें भगवती विन्ध्यवासिनीदेवीकी महिमाका विशेषरूपसे प्रचार किया। विन्ध्यवासिनी भगवतीके स्थानमें नौ रात्रि, तीन रात्रि, एक रात्रि उपवास या अयाचितव्रत अथवा नक्तव्रत कर अनेक प्रकारके उपचारोंसे भगवतीकी आराधना करनी चाहिये। ग्राम-ग्राम, नगर-नगर और घर-घरमें सभी लोगोंको स्नान कर प्रसन्नचित्त होकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री आदि सभीको भगवतीकी पूजा करनी चाहिये। विशेषकर राजाओंको तो यह पूजन अवश्य करना चाहिये।
विजयकी इच्छा रखनेवाले राजाको प्रतिपदासे अष्टमीपर्यन्त लोहाभिहारिक कर्म (अस्त्र-शस्त्र-पूजन) करना चाहिये। सर्वप्रथम पूर्वोत्तर ढालवाली भूमिमें नौ अथवा सात हाथ लम्बा-चौड़ा, पताकाओंसे सुसज्जित एक मण्डप बनाना चाहिये। उसमें अग्निकोणमें तीन मेखला और पीपलके समान योनिसे युक्त एक अति सुन्दर एक हाथके कुण्डकी रचना करनी चाहिये। राजाके चिह्न—छत्र, चामर, सिंहसन, अश्व, ध्वजा, पताका आदि और सभी प्रकारके अस्त्र-शस्त्र मण्डपमें लाकर रखे। उन सबका अधिवासन करे। इसके अनन्तर ब्राह्मणको चाहिये कि वह स्नानकर श्वेत वस्त्र धारणकर मण्डपादिकी पूजा करे और फिर ओंकारपूर्वक राजचिह्नोंके निर्दिष्ट मन्त्रोंद्वारा घृतसे संयुक्त पायससे हवन-कर्म करे। पूर्वकालमें बहुत
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