सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 559, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 559

५४८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

ही बलवान्, शक्तिशाली लोह नामका एक दैत्य पैदा हुआ था। उसको देवताओंने मारकर खण्ड-खण्ड कर पृथ्वीपर गिरा दिया। वही दैत्य आज लोहाके रूपमें दिखायी पड़ता है। उसीके अङ्गोंसे ही विभिन्न प्रकारके लोहेकी उत्पत्ति हुई है। इसलिये उसी समयसे लोहाभिहारिक कर्म राजाओंको विजय प्राप्त करनेमें सहायक सिद्ध हुआ, ऐसा ऋषियोंने बतलाया है। हवनका बचा हुआ शेष पायस हाथी और घोड़ोंको खिलाकर उनको अलंकृत कर माङ्गलिक घोष करते हुए रक्षकोंके साथ समारोहपूर्वक नगरमें घुमाना चाहिये। राजाको भी प्रतिदिन स्नानकर पितरों और देवताओंकी पूजा करनेके बाद राजचिह्नोंकी भी भलीभाँति पूजा करनी चाहिये। इससे राजाको विजय, कीर्ति, आयु, यश तथा बलकी प्राप्ति होती है।

इस प्रकार लोहाभिहारिक कर्म करनेके अनन्तर अष्टमीके दिन पूर्वोह्नमें स्नान कर नियमपूर्वक सुवर्ण, चाँदी, पीतल, ताँबा, मृत्तिका, पाषाण, काष्ठ आदिकी दुर्गाकी सुन्दर मूर्ति बनाकर उत्तम सुसज्जित स्थानके बीच सिंहासनके ऊपर स्थापित करे। कुंकुम, चन्दन, सिन्दूर आदिसे उस मूर्तिको चर्चित कर कमल आदि पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य आदिसे अनेक बाजे-गाजेके साथ उनका पूजन करना चाहिये। वन्दीजन स्तुति करें। बहुतसे लोग छत्र-चामर आदि राजचिह्न लेकर चारों ओर खड़े होकर स्थित रहें। दीक्षायुक्त राजा पुरोहितके साथ बिल्वपत्रोंसे भगवतीकी इस मन्त्रसे पूजा करे—

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥

अमृतोद्भवः श्रीवृक्षो महादेवीप्रियः सदा।

बिल्वपत्रं प्रयच्छामि पवित्रं ते सुरेश्वरि ॥

(उत्तरपर्व १३८।८६-८७)

इस प्रकार पूजनकर उसी दिनसे द्रोणपुष्पी (गूमा)-से पूजा करनी चाहिये। असुरोंके साथ युद्ध करनेसे जो क्षति भगवतीके शरीरको हुई उसकी पूर्ति द्रोणपुष्पीसे ही हुई। इसलिये द्रोणपुष्पी भगवतीको अत्यन्त प्रिय है। फिर शत्रुओंके वधके लिये खड्गको प्रणामकर सुभिक्ष, राज्य और अपने विजयकी प्राप्ति-हेतु भगवतीसे प्रार्थना करनी चाहिये और उनका ध्यान तथा इस स्तुतिका पाठ करना चाहिये—

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

कुंकुमेन समालब्धे चन्दनेन विलेपिते।

बिल्वपत्रकृतामाले दुर्गेऽहं शरणं गतः ॥

(उत्तरपर्व १३८।९३-९४)

इस प्रकार अष्टमीको सब प्रकारसे भगवतीका पूजन कर रात्रिको जागरण करना चाहिये और नृत्यादिक उत्सव कराना चाहिये। प्रसन्नतापूर्वक रात्रिके बीत जानेपर नवमीको प्रातःकाल भगवतीकी बड़े समारोहके साथ विशेष पूजा करनी चाहिये। अपराह्न-समयमें रथके बीच भगवती दुर्गाकी प्रतिमाको स्थापित कर पूरे राज्यभरमें भ्रमण कराना चाहिये। अपनी सेनासहित राजाको भी साथ रहना चाहिये।

सभी प्रकारके विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये भूतशान्ति करनी चाहिये। जिससे यात्रा निर्विघ्न पूर्ण हो। इस विधिसे जो राजा अथवा सामान्य व्यक्ति भगवतीकी यात्रा करता है, वह सभी प्रकारके पापोंसे छूटकर भगवतीके लोकको प्राप्त कर लेता है और उस व्यक्तिको शत्रु, चोर, ग्रह, विघ्न आदिका भय नहीं होता। भगवतीके भक्त सदा नीरोग, सुखी और निर्भय हो जाते हैं। जो व्यक्ति भगवतीके उत्सव-विधिका श्रवण करता है या पढ़ता है, उसके भी सभी अमङ्गल दूर हो जाते हैं। (अध्याय १३८)

584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section_19_2_Back In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharada Peeth