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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 547, कुल 654 में से

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पृष्ठ 547

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! यदि और कुछ करना सम्भव न हो तो सबसे सरल उपाय यह है कि चारों तरफसे चितवृत्ति हटाकर गोविन्दका स्मरण करते हुए प्राणका त्याग करना चाहिये, क्योंकि व्यक्ति जिस-जिस भावका स्मरण कर प्राण त्यागता है, उसे वही भाव प्राप्त होता है। अतः सब प्रकारसे निवृत्त होकर निरन्तर वासुदेवका चिन्तन करना चाहिये१।

राजन्! अब आप भगवान् के चिन्तन-ध्यानके स्वरूपोंको सुनें, जिन्हें महर्षि मार्कण्डेयजीने मुझसे कहा था—राज्य, उपभोग, शयन, भोजन, वाहन, मणि, स्त्री, गन्ध, माल्य, वस्त्र, आभूषण आदिमें यदि अत्यन्त मोह रहता है तो यह रागजनित 'आद्य' ध्यान है।

यदि जलाने, मारने, तड़पाने, किसीके ऊपर प्रहार करनेकी द्वेषपूर्ण वृत्ति हो और दया न आये

तो इसे ही क्रोधजनित 'रौद्र' ध्यान कहा गया है। वेदार्थके चिन्तन, इन्द्रियोंके उपशमन, मोक्षकी चिन्ता, प्राणियोंके कल्याणकी भावना आदि ही धर्मपूर्ण सात्त्विक ('धर्म्य') ध्यान है। समस्त इन्द्रियोंका अपने-अपने विषयोंसे निवृत्त हो जाना, हृदयमें इष्ट-अनिष्ट किसीकी भी चिन्ता नहीं करना और आत्मस्थिर होकर एकमात्र परमेश्वरका चिन्तन करना, परमात्मनिष्ठ हो जाना—यह 'शुक्ल'-ध्यानका स्वरूप है। 'आद्य'-ध्यानसे तिर्यक्-योन तथा अधोगतिकी प्राप्ति होती है, 'रौद्र'-ध्यानसे नरक प्राप्त होता है। 'धर्म्य' (सात्त्विक)-ध्यानसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है और 'शुक्ल'-ध्यानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। इसलिये ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे कल्याणकारी 'शुक्ल'-ध्यानमें ही मन-चित्त सदा लगा रहे।

(अध्याय १२६)

इष्टार्पृत् के महिमा

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— राजन्! विधिपूर्वक वापी, कूप, तडाग, बावली, वृक्षोद्यान तथा देवमन्दिर आदिका निर्माण करानेवाले तथा इन कार्योंमें सहयोगी—कर्मकार शिल्पी, सूत्रधार आदि सभी पुण्यकर्म पुरुष अपने इष्टार्पृत्थर्मके प्रभावसे सूर्य एवं चन्द्रमाकी प्रभाके समान कान्तिमान् विमानमें बैठकर दिव्यलोकको प्राप्त करते हैं। जलाशय आदिकी खुदाईके समय जो जीव मर जाते हैं, उन्हें भी उत्तम गति प्राप्त होती है। गायके शरीरमें जितने भी रोमकूप हैं, उतने दिव्य वर्षतक

तडाग आदिका निर्माण करनेवाला स्वर्गमें निवास करता है। यदि उसके पितर दुर्गतिको प्राप्त हुए हों तो उनका भी वह उद्धार कर देता है। पितृगण यह गाथा गाते हैं कि देखो! हमारे कुलमें एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसने जलाशयका निर्माणकर प्रतिष्ठा की। जिस तालाबके जलको पीकर गौएँ संतुप्त हो जाती हैं, उस तालाब बनवानेवालेके सात कुलोंका उद्धार हो जाता है। तडाग, वापी, देवालय और सघन छायावाले वृक्ष—ये चारों इस संसारसे उद्धार करते हैं।

१-तिष्ठन् भुञ्जन् स्वप्नं गच्छन्तथा धावन्तितस्ततः । उल्लासिकाले गोविन्दं संस्मरन्तन्मयो भवेत् ॥

यं यं चापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥

(उत्तरपर्व १२६। ३९-४०)

२-भविष्यपुराणमें यह विषय तीन पर्वोंमें तीन बार आया है और वेदोंसे लेकर स्मृतियों तथा अन्य पुराणोंमें भी बार-बार आता है। यह अन्तर्वेदी और बहिर्वेदीके नामसे विख्यात है। इसमें जलाशय, वृक्ष, उद्यान आदि लगानेसे सर्वाधिक पुण्योंका लाभ बताया गया है। यहाँ इसका थोड़ा-सा संक्षेप कर दिया गया है। मात्र सारभूत बातें दी गयी हैं।

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