भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 546, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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नेत्रों तथा कानोंमें मित्ररूपमें भगवान् विष्णु ही विराज रहे हैं *।'
इस प्रकार सब कुछ छोड़कर सर्वेश भगवान् अच्युतको हृदयमें धारण कर निरन्तर वासुदेवके नामका कीर्तन करता रहे और जब मृत्यु अति समीप आ जाय, तब दक्षिणाग्र कुशा बिछाकर पूर्व अथवा उत्तरकी ओर सिरकर शयन करे तथा जगत्पति भगवान् विष्णुका इस प्रकार चिन्तन करे— विष्णुं जिष्णुं हृषीकेशं केशवं मधुसूदनम्। नारायणं नरं शौरिं वासुदेवं जनार्दनम्॥ वाराहं यज्ञपुरुषं पुण्डरीकाक्षमच्युतम्। वामनं श्रीधरं कृष्णं नृसिंहमपराजितम्॥ पद्मनाभमजं श्रीशं दामोदरमधोक्षजम्। सर्वेश्वरेश्वरं शुद्धमनन्तं विश्वरूपिणम्॥ चक्रिणं गदिनं शान्तं शङ्खिणं गरुडध्वजम्। किरीटकौस्तुभधरं प्रणामात्म्यहमव्ययम्॥ अहमस्मि जगन्नाथ मयि वासं कुरु द्रुतम्। आवयोरन्तरं मास्तु समीराकाशयोरिव॥ अयं विष्णुरयं शौरिरयं कृष्णः पुरो मम। नीलोत्पलदलश्यामः पद्मपत्रायतेक्षणः॥ एष पश्यतु मामीशः पश्याम्यहमधोक्षजम्। इत्थं जपेदेकमनाः स्मरन् सर्वेश्वरं हरिम्॥
(उत्तरपर्व १२६।१९—२५)
'भगवान् विष्णु, जिष्णु, हृषीकेश, केशव, मधुसूदन, नारायण, नर, शौरि, वासुदेव, जनार्दन, वाराह, यज्ञपुरुष, पुण्डरीकाक्ष, अच्युत, वामन, श्रीधर, कृष्ण, नृसिंह, अपराजित, पद्मनाभ, अज, श्रीश,
दामोदर, अधोक्षज, सर्वेश्वरेश्वर, शुद्ध, अनन्त, विश्वरूपी, चक्री, गदी, शान्त, शङ्खी, गरुडध्वज, किरीटकौस्तुभधर तथा अव्यय परमात्माको मैं प्रणाम करता हूँ। जगन्नाथ! मैं आपका ही हूँ, आप शीघ्र मुझमें निवास करें। वायु एवं आकाशकी तरह मुझमें और आपमें कोई अन्तर न रहे। मैं नीले कमलके समान श्यामवर्ण, कमलनयन भगवान् विष्णु अथवा शौरि या भगवान् श्रीकृष्ण आपको अपने सामने देख रहा हूँ, आप भी मुझे देखें।'
इन मन्त्रोंको पढ़कर भगवान् विष्णुको प्रणाम करे और उनका दर्शन करे तथा 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस मन्त्रका निरन्तर जप करता रहे। जो व्यक्ति प्रसन्नमुख, शङ्ख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण किये हुए, केयूर, कटक, कुण्डल, श्रीवत्स, पीताम्बर आदिसे विभूषित, नवीन मेघके समान श्यामस्वरूप भगवान् विष्णुका ध्यान कर प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो भगवान् अच्युतमें लीन हो जाता है।
राजा युधिष्ठिरने पुनः पूछा—भगवन्! अन्त समयकी जो यह विधि आपने बतायी, वह स्वस्थचित्त रहनेपर ही सम्भव है, परंतु अन्तसमयमें तरुण और नीरोगी पुरुषोंकी भी चित्तवृत्ति मोहग्रस्त हो जाती है, वृद्ध और रोगियोंकी तो बात ही क्या है। अतिवृद्ध और रोगग्रस्त व्यक्तिके लिये कुशाके आसनपर ध्यान करना तो असम्भव ही है। इसलिये प्रभो! दूसरा भी कोई सुगम उपाय बतानेका कष्ट करें, जिससे साधन निष्फल न हो।
- परित्यजाम्यहं भोगांस्त्यजामि सुहृदोऽखिलान्। भोजनं हि मयोत्सृष्टमुत्सृष्टमनुलेपनम्॥ स्नान्भूषणादिकं गेयं दानमासनमेव च। होमादयः पदार्था ये ये च नित्यक्रमगताः॥ नैमित्तिकास्तथा काभ्याः श्राद्धधर्मादयोज्झिताः। त्यक्ताश्चाश्रमिका धर्मा वर्णधर्मास्तथोज्झिताः॥ पदभ्यां कराभ्यां विहरन् कुर्वाणः कर्म चोद्दहनं। न पापं कस्यचिन्नाय्याः प्राणिनः सन्तु निर्भयाः॥ नभसि प्राणिनो ये च ये जले ये च भूतले। क्षितैर्विवरगा ये च ये च पापाणसम्पुटे॥ धान्यादिषु च वस्त्रेषु शयनेष्वासनेषु च। ते स्वयं तु विवृध्यन्ते दत्तं तेभ्योऽभयं मया॥ न मेऽस्ति बान्धवः कश्चिद्विष्णुं मुक्त्वा जगदगुरुम्। मित्रपक्षे च मे विष्णुरधश्चोर्ध्वं तथा पुनः॥ पार्श्वतो मूर्ध्नि हृदये बाहुभ्यां चैव चक्षुषोः। श्रोत्रादिषु च सर्वेषु मम विष्णुः प्रतिष्ठितः॥ (उत्तरपर्व १२६।१९—१६)
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