भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
तत्पश्चात् वे द्विजवर उन्हीं मन्त्रोंको वस्त्र-पट्ट अथवा कमलदलपर अङ्कित करें, फिर द्रव्ययुक्त उन कलशोंको यजमानके सिरपर रख दें। उस समय यजमान पूर्वाभिमुख हो अपने इष्टदेवकी पूजा कर उन्हें नमस्कार करते हुए ग्रहण-कालकी वेलाको व्यतीत करे। चन्द्र-ग्रहणके निवृत्त हो जानेपर माङ्गलिक कार्य कर गोदान करे और उस (मन्त्रद्वारा अङ्कित) पट्टको स्नानादिसे शुद्ध हुए ब्राह्मणको दान कर दे।
जो मानव इस उपर्युक्त विधिके अनुसार ग्रहणका स्नान करता है, उसे न तो ग्रहणजन्म पीडा
होती है और न उसके बन्धुजनोंका विनाश ही होता है, अपितु उसे पुनरागमनरहित परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है। सूर्य-ग्रहणमें मन्त्रोंमें सदा सूर्यका नाम उच्चारण करना चाहिये। इसके अतिरिक्त चन्द्र-ग्रहण एवं सूर्य-ग्रहण—दोनों अवसरोंपर सूर्यके निमित्त पद्मराग मणि और निशापति चन्द्रमाके निमित्त एक सुन्दर कपिला गौका दान करनेका विधान है। जो मनुष्य इस (ग्रहण-स्नानकी विधि)-को नित्य सुनता अथवा दूसरेको श्रवण कराता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। (अध्याय १२५)
मरणासन्न (मृत्युके पूर्व) प्राणीके कर्तव्य तथा ध्यानके चतुर्विध भेद
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! गृहस्थ व्यक्तिको अपने अन्त समयमें क्या करना चाहिये*। कृपाकर इस विधिको आप बतायें। मुझे यह सुननेकी बहुत ही अभिलाषा है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! जब मनुष्यको यह ज्ञात हो जाय कि उसका अन्त समीप आ गया है तो उसे गरुडध्वज भगवान् विष्णुका स्मरण करना चाहिये। स्नान करके पवित्र हो शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण कर अनेक प्रकारके पुष्पादि उपचारोंसे नारायणकी पूजा एवं स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करे। अपनी शक्तिके अनुसार गाय, भूमि, सुवर्ण, वस्त्र आदिका दान करे और बन्धु, पुत्र, मित्र, स्त्री, क्षेत्र, धन, धान्य तथा पशु आदिसे चित्तको हटाकर ममत्वका परित्याग कर दे। मित्र, शत्रु, उदासीन अपने और पराये लोगोंके उपकार और अपकारके विषयमें विचार न करे अर्थात् शान्त हो जाय। प्रयत्नपूर्वक
सभी शुभ एवं अशुभ कर्मोंका परित्याग कर इन श्लोकोंका स्मरण करे—‘मैंने समस्त भोगों एवं मित्रोंका परित्याग कर दिया, भोजन भी छोड़ दिया तथा अनुलेपन, माला, आभूषण, गीत, दान, आसन, हवन आदि क्रियाएँ, पदार्थ, नित्य-नैमित्तिक और काम्य सभी क्रियाओंका उत्सर्जन कर दिया है। श्राद्धधर्मोंका भी मैंने परित्याग कर दिया है, आश्रमधर्म और वर्णधर्म भी मैंने छोड़ दिये हैं। जबतक मेरे हाथ-पैर चल रहे हैं, तबतक मैं स्वयं अपना कार्य कर लूँगा, मुझसे सभी निर्भय रहें, कोई भी पाप कर्म न करे। आकाश, जल, पृथ्वी, विवर, बिल, पर्वत, पत्थरोंके मध्य, धान्यादि फसलों, वस्त्र, शयन तथा आसनों आदिमें जो कोई प्राणी अवस्थित हैं, वे मुझसे निर्भय होकर सुखी रहें। जगदुरु भगवान् विष्णुके अतिरिक्त मेरा कोई बन्धु नहीं। मेरे नीचे-ऊपर, दाहिने-बायें, मस्तक, हृदय, बाहुओं,
- इसी तरहकी बातें गरुडपुराण, भागवत १।१९।३७-३८ आदिमें महाराज परीक्षितद्वारा महर्षि शुक्रदेवजी आदिसे पूछी गयी हैं तथा मनुष्यके जीवनका कब अन्त हो जाय, यह नहीं कहा जा सकता। अतः सदा ही ध्यानपूर्वक भगवान्का स्मरण-भजन करते रहना चाहिये, यही सबका सारंश है।
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