भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • ब्राह्मपर्व *

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स्त्रियाँ अपने ससुर आदि पूज्य जनोंका पूजन करें एवं उन्हें भोजन करायें। इस व्रतके करनेसे अखण्ड सौभाग्यकी प्राप्ति होती है, समस्त विघ्न दूर होते हैं और गणेशजीकी कृपा प्राप्त होती है।

किसी भी महीनेके भौमवारयुक्त शुक्ला चतुर्थीको 'सुखा' कहते हैं। यह व्रत स्त्रियोंको सौभाग्य, उत्तम रूप और सुख देनेवाला है। भगवान् शङ्कर एवं माता पार्वतीके संयुक्त तेजसे भूमिद्वारा रक्तवर्णके मङ्गलकी उत्पत्ति हुई। भूमिका पुत्र होनेसे वह भौम कहलाया और कुज, रक्त, वीर, अङ्गारक आदि नामोंसे प्रसिद्ध हुआ। वह शरीरके अङ्गोंकी रक्षा करनेवाला तथा सौभाग्य आदि देनेवाला है, इसीलिये अङ्गारक कहलाया। जो पुरुष अथवा स्त्री भौमवारयुक्त शुक्ला चतुर्थीको उपवास करके भक्तिपूर्वक प्रथम गणेशजीका, तदनन्तर रक्त चन्दन, रक्त पुष्प आदिसे भौमका पूजन करते हैं, उन्हें सौभाग्य और उत्तम रूप-सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है।

प्रथम संकल्पकर स्नान करे, अनन्तर गणेश-स्मरणपूर्वक हाथमें शुद्ध मृत्तिका लेकर इस मन्त्रको पढ़ें—

इह त्वं वन्दिता पूर्वं कृष्णोन्मुखरता किल। तस्मान्मे दह पाप्मानं यन्मया पूर्वसंचितम्॥

(ब्राह्मपर्व ३१।२४)

इसके बाद मृत्तिकाको गङ्गाजलसे मिश्रितकर सूर्यके सामने करे, तदनन्तर अपने सिर आदि अङ्गोंमें लगाये और फिर जलके मध्य खड़ा होकर इस मन्त्रको पढ़कर नमस्कार करे—

त्वमापो योनिः सर्वेषां दैत्यदानवद्यौकसाम्। स्वेदाण्डजोद्भिदां चैव रसानां पतये नमः॥

(ब्राह्मपर्व ३१।२७)

अनन्तर सभी तीर्थों, नदियों, सरोवरों, झरनों और तालाबोंमें मैंने स्नान किया—इस प्रकार भावना करता हुआ गोते लगाकर स्नान करे, फिर

पवित्र होकर घरमें आकर दूर्वा, पीपल, शमी तथा गौका स्पर्श करे। इनके स्पर्श करनेके मन्त्र इस प्रकार हैं —

दूर्वा स्पर्श करनेका मन्त्र

त्वं दूर्वैऽमृतनामासि सर्वदेवैस्तु वन्दिता॥ वन्दिता दह तत्सर्वं दुरितं यन्मया कृतम्।

(ब्राह्मपर्व ३१।३१-३२)

शमी स्पर्श करनेका मन्त्र

पवित्राणां पवित्रा त्वं काश्यपी प्रथिता श्रुतौ। शमी शमय मे पापं नूनं वेत्सि धराधरान्॥

(ब्राह्मपर्व ३१।३३)

पीपल-वृक्ष स्पर्श करनेका मन्त्र

नेत्रस्पन्दादिजं दुःखं दुःस्वप्नं दुर्विचिन्तनम्। शक्तानां च समुद्योगमश्रुत्य त्वं क्षमस्व मे॥

(ब्राह्मपर्व ३१।३४)

गौको स्पर्श करनेका मन्त्र

सर्वदेवमयी देवि मुनिभित्तु सुपूजिता। तस्मात् स्पृशामि वन्दे त्वां वन्दिता पापहा भव॥

(ब्राह्मपर्व ३१।३६)

श्रद्धापूर्वक पहले गौकी प्रदक्षिणा कर उपर्युक्त मन्त्रको पढ़ें और गौका स्पर्श करे। जो गौकी प्रदक्षिणा करता है, उसे सम्पूर्ण पृथ्वीकी प्रदक्षिणाका फल प्राप्त होता है।

इस प्रकार इनको स्पर्शकर, हाथ-पैर धोकर, आसनपर बैठकर आचमन करे। अनन्तर खदिर (खैर)-की समिधाओंसे अग्नि प्रज्वलित कर घृत, दुग्ध, यव, तिल तथा विविध भक्ष्य पदार्थोंसे मन्त्र पढ़ते हुए हवन करे। आहुति इन मन्त्रोंसे दे—ॐ शर्वाय स्वाहा, ॐ शर्वपुत्राय स्वाहा, ॐ क्षोण्युत्सङ्गभवाय स्वाहा, ॐ कुजाय स्वाहा, ॐ ललिताङ्गाय स्वाहा तथा ॐ लोहिताङ्गाय स्वाहा। इन प्रत्येक मन्त्रोंसे १०८ या अपनी शक्तिके अनुसार आहुति दे। अनन्तर सुवर्ण, चाँदी, चन्दन या देवदारुके

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