भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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शरीरमें लिपट जाओ, जिससे यह कृष्णवर्णका दिखायी देने लगे। ताकि मैं अपनी सौत विनताको जीतकर उसे अपनी दासी बना सकूँ।' माताके इस वचनको सुनकर नागोंने कहा—'माँ! यह छल तो हमलोग नहीं करेंगे, चाहे तुम्हारी जीत हो या हार। छलसे जीतना बहुत बड़ा अधर्म है।' पुत्रोंका यह वचन सुनकर कदूने क्रुद्ध होकर कहा—तुमलोग मेरी आज्ञा नहीं मानते हो, इसलिये मैं तुम्हें शाप देती हूँ कि 'पाण्डवोंके वंशमें उत्पन्न राजा जनमेजय जब सर्प-सत्र करेंगे, तब उस यज्ञमें तुम सभी अग्निमें जल जाओगे।' इतना कहकर कदू चुप हो गयी। नागगण माताका शाप सुनकर बहुत घबड़ाये और वासुकि को साथमें लेकर ब्रह्माजीके पास पहुँचे तथा ब्रह्माजीको अपना सारा वृत्तान्त सुनाया। इसपर ब्रह्माजीने कहा कि वासुके! चिन्ता मत करो। मेरी बात सुनो—यायावर-वंशमें बहुत बड़ा तपस्वी जरत्कारु नामका ब्राह्मण उत्पन्न होगा। उसके साथ तुम अपनी जरत्कारु नामवाली बहिनका विवाह कर देना और वह जो भी कहे, उसका वचन स्वीकार करना। उसे आस्तीक नामका विख्यात पुत्र उत्पन्न होगा, वह जनमेजयके सर्पयज्ञको रोकेगा और तुमलोगोंकी रक्षा करेगा। ब्रह्माजीके इस वचनको सुनकर नागराज वासुकि आदि अतिशय प्रसन्न हो, उन्हें प्रणाम कर अपने लोकमें आ गये।
सुमन्तु मुनिने इस कथाको सुनाकर कहा—राजन्! यह यज्ञ तुम्हारे पिता राजा जनमेजयने किया था। यही बात श्रीकृष्णभगवान्ने भी युधिष्ठिरसे कही थी कि 'राजन्! आजसे सौ वर्षके बाद सर्पयज्ञ होगा, जिसमें बड़े-बड़े विषधर और दुष्ट नाग नष्ट हो जायेंगे। करोड़ों नाग जब अग्निमें दग्ध होने लेंगे, तब आस्तीक नामक ब्राह्मण
सर्पयज्ञ रोककर नागोंकी रक्षा करेगा।' ब्रह्माजीने पञ्चमीके दिन वर दिया था और आस्तीक मुनिने पञ्चमीको ही नागोंकी रक्षा की थी, अतः पञ्चमी तिथि नागोंको बहुत प्रिय है*।
पञ्चमीके दिन नागोंकी पूजा कर यह प्रार्थना करनी चाहिये कि जो नाग पृथ्वीमें, आकाशमें, स्वर्गमें, सूर्यकी किरणोंमें, सरोवरोंमें, वापी, कूप, तालाब आदिमें रहते हैं, वे सब हमपर प्रसन्न हों, हम उनको बार-बार नमस्कार करते हैं—
सर्वे नागाः प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले॥ ये च हेलिमरीचिस्था येऽन्तरे दिवि संस्थिताः। ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिनः। ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नमः॥
(ब्राह्मपर्व ३२।३३-३४)
इस प्रकार नागोंको विसर्जित कर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये और स्वयं अपने कुटुम्बियोंके साथ भोजन करना चाहिये। प्रथम मीठा भोजन करना चाहिये, अनन्तर अपनी अभिरुचिके अनुसार भोजन करे।
इस प्रकार नियमानुसार जो पञ्चमीको नागोंका पूजन करता है, वह श्रेष्ठ विमानमें बैठकर नागलोकको जाता है और बादमें द्वारपरयुगमें बहुत पराक्रमी, रोगरहित तथा प्रतापी राजा होता है। इसलिये घी, खीर तथा गुग्गुलसे इन नागोंकी पूजा करनी चाहिये।
राजाने पूछा—महाराज! क्रुद्ध सर्पके काटनेसे मरनेवाला व्यक्ति किस गतिको प्राप्त होता है और जिसके माता-पिता, भाई, पुत्र आदि सर्पके काटनेसे मरे हों, उनके उद्धारके लिये कौन-सा व्रत, दान अथवा उपवास करना चाहिये, यह आप बतायें।
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! सर्पके काटनेसे जो मरता है, वह अधोगतिको प्राप्त होता है तथा
- पञ्चम्यां तत्र भविता ब्रह्मा प्रोवाच लेलिहान्।
तस्मादियं महाबाहो पञ्चमी दधिता सदा। नागानामानन्दकरी दत्ता वै ब्रह्मणा पुरा॥ (ब्राह्मपर्व ३२।३२)
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