भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

श्रीसूर्यनारायणके नित्यार्चनका विधान

भगवान् श्रीकृष्णाने कहा—साम्ब! अब हम सूर्यनारायणके पूजनका विधान बताते हैं, जिसके करनेसे सम्पूर्ण पाप और विघ्न नष्ट हो जाते हैं तथा सभी मनोरथोंकी सिद्धि होती है और पुण्य भी प्राप्त होता है। प्रातःकाल उठकर शौच आदिसे निवृत्त हो नदीके तटपर जाकर आचमन करे तथा सूर्योदयके समय शुद्ध मृत्तिकाका शरीरपर लेपन कर स्नान करे। पुनः आचमन कर शुद्ध वस्त्र धारण करे और ससाक्षर-मन्त्र 'ॐ खखोल्लाक्य स्वाहा' से सूर्यभगवान्को अर्घ्य दे तथा हृदयमें मन्त्रका ध्यान करे एवं सूर्य-मन्दिरमें जाकर सूर्यकी पूजा करे। सर्वप्रथम श्रद्धापूर्वक पूरक, रेचक और कुम्भक नामक प्राणायाम कर वायवी, आग्रेयी, माहेन्द्री तथा वारुणी धारणा करके भूतशुद्धिकी रीतिसे शरीरका शोषण, दहन, स्तम्भन एवं प्लावन करके अपने शरीरकी शुद्धि कर ले। अपने शुद्ध हृदयमें भगवान् सूर्यकी भावना कर उन्हें प्रणाम करे। स्थूल, सूक्ष्म शरीर तथा इन्द्रियोंको अपने-अपने स्थानोंमें उपन्यस्त करे। 'ॐ खः स्वाहा हृदयाय नमः, ॐ खं स्वाहा शिरसे स्वाहा, ॐ उल्लाक्य स्वाहा शिखायै वषट्, ॐ याय स्वाहा कवचाय हुम्, ॐ स्वां स्वाहा नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ हां स्वाहा अस्त्राय फट्।'

—इन मन्त्रोंसे अङ्गन्यास कर पूजन-सामग्रीका मूल मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलद्वारा प्रोक्षण करे। फिर सुगन्धित पुष्पादि उपचारोंसे सूर्यभगवान्का पूजन करे। सूर्यनारायणकी पूजा दिनेके समय सूर्य-मूर्तिमें और रात्रिके समय अग्रिममें करनी चाहिये। प्रभातकालमें पूर्वाभिमुख, सायंकालमें पश्चिमाभिमुख तथा रात्रिमें उत्तराभिमुख होकर पूजन करनेका विधान है। 'ॐ खखोल्लाक्य स्वाहा' इस ससाक्षर मूल मन्त्रसे सूर्यमण्डलके बीच षट्दल-कमलका

ध्यान कर उसके मध्यमें सहस्र किरणोंसे देदीप्यमान भगवान् सूर्यनारायणकी मूर्तिका ध्यान करे। फिर रक्त चन्दन, करवीर आदि रक्त पुष्पों, धूप, दीप, अनेक प्रकारके नैवेद्य, वस्त्राभूषण आदि उपचारोंसे पूजन करे अथवा रक्त चन्दनसे ताम्रपात्रमें षट्दल-कमल बनाकर उसके मध्यमें सभी उपचारोंसे भगवान् सूर्यनारायणका पूजन करे। छहों दलोंमें षडङ्ग-पूजन कर उत्तर आदि दिशाओंमें सोमादि आठ ग्रहोंका अर्चन करे और अष्टदिकपालों तथा उनके आयुधोंका भी तत्तद् दिशाओंमें पूजन करे। नामके आदिमें 'प्रणव' लगाकर नामको चतुर्थी-विभक्तिपुत्र करके अन्तमें 'नमः' कहे—जैसे 'ॐ सोमाय नमः' इत्यादि। इस प्रकार नाममन्त्रोंसे सबका पूजन करे। अनन्तर व्योम-मुद्रा, रवि-मुद्रा, पद्म-मुद्रा, महाश्वेत-मुद्रा और अस्त्र-मुद्रा दिखाये। ये पाँच मुद्राएँ पूजा, जप, ध्यान, अर्घ्य आदिके अनन्तर दिखानी चाहिये।

इस प्रकार एक वर्षतक भक्तिपूर्वक तन्मयताके साथ भगवान् सूर्यनारायणका पूजन करनेसे अभीष्ट मनोरथोंकी प्राप्ति होती है और बादमें मुक्ति भी प्राप्त होती है। इस विधिसे पूजन करनेपर रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है, धनहीन धन प्राप्त करता है, राज्यभ्रष्टको राज्य मिल जाता है तथा पुत्रहीन पुत्र प्राप्त करता है। सूर्यनारायणका पूजन करनेवाला पुरुष प्रज्ञा, मेधा तथा सभी समृद्धियोंसे सम्पन्न होता हुआ चिरंजीवी होता है। इस विधिसे पूजन करनेपर कन्याको उत्तम वरकी, कुरूपा स्त्रीको उत्तम सौभाग्यकी तथा विद्यार्थीको सद्बुद्धाकी प्राप्ति होती है। ऐसा सूर्यभगवान्ने स्वयं अपने मुखसे कहा है। इस प्रकार सूर्यभगवान्का पूजन करनेसे धन, धान्य, संतान, पशु आदिकी नित्य अभिवृद्धि होती है। मनुष्य निष्काम हो जाता है तथा अन्तमें उसे सद्गति प्राप्त होती है। (अध्याय ४९)

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