भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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भगवान् सूर्यके पूजन एवं व्रतोद्यापनका विधान, द्वादश आदित्योंके नाम और रथससमी-व्रतकी महिमा
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—साम्ब! अब मैं सूर्यके विशिष्ट अवसरोंपर होनेवाले व्रत-उत्सव एवं पूजनकी विधियोंका वर्णन करता हूँ, उन्हें सुनो। किसी मासके शुक्लपक्षकी ससमी, ग्रहण या संक्रान्तिके एक दिन-पूर्व एक बार हविष्यान्नका भोजन कर सायंकालके समय भलीभाँति आचमन आदि करके अरुणदेवको प्रणाम करना चाहिये तथा सभी इन्द्रियोंको संयतकर भगवान् सूर्यका ध्यान कर रात्रिमें जमीनपर कुशकी शय्यापर शयन करना चाहिये। दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक स्नान सम्पन्न करके संध्या करे तथा पूर्वोक्त मन्त्र ‘ॐ खखोल्लकाय स्वाहा’ का जप एवं सूर्यभगवान्की पूजा करे। अग्निको सूर्यतापके रूपमें समझकर वेदी बनाये और संक्षेपमें हवन तथा तर्पण करे। गायत्री-मन्त्रसे प्रोक्षणकर पूर्वाग्रि और उत्तराग्र कुशा बिछाये। अनन्तर सभी पात्रोंका शोधन कर दो, कुशाओंकी प्रादेशमात्रकी एक पवित्री बनाये। उस पवित्रीसे सभी वस्तुओंका प्रोक्षण करे, घीको अग्निपर रखकर पिघला ले, उत्तरकी ओर पात्रमें उसे रख दे, अनन्तर जलते हुए उल्लुकसे पर्यग्रिकरण करते हुए घृतका तीन बार उत्प्लवन करे। खुवा आदिका कुशोंके द्वारा परिमार्जन और सम्प्रोक्षण करके अग्निमें सूर्यदेवकी पूजा करे और दाहिने हाथमें खुवा ग्रहणकर मूल मन्त्रसे हवन करे। मनोयोगपूर्वक मौन धारण कर सभी क्रियाएँ सम्पन्न करनी चाहिये। पूर्णाहुतिके पश्चात् तर्पण करे। अनन्तर ब्राह्मणोंको उत्तम भोजन कराना चाहिये और यथाशक्ति उनको दक्षिणा भी देनी चाहिये। ऐसा करनेसे मनोवाञ्छित
फलकी प्राप्ति होती है।
माघ मासकी ससमीको वरुण नामक सूर्यकी पूजा करे। इसी प्रकार क्रमशः फाल्गुनमें सूर्य, चैत्रमें वैशाख*, वैशाखमें धाता, ज्येष्ठमें इन्द्र, आषाढ़में रवि, श्रावणमें नभ, भाद्रपदमें यम, आश्विनमें पर्जन्य, कार्तिकमें त्वष्टा, मार्गशीर्षमें मित्र तथा पौष मासमें विष्णु नामक सूर्यका अर्चन करे। इस विधिसे बारहों मासमें अलग-अलग नामोंसे भगवान् सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एक दिन पूजा करनेसे वर्षपर्यन्त की गयी पूजाका फल प्राप्त हो जाता है।
उपर्युक्त विधिसे एक वर्षतक व्रत कर रत्नजटित सुवर्णका एक रथ बनवाये और उसमें सात घोड़े बनवाये। रथके मध्यमें सोनेके कमलके ऊपर रत्नोंके आभूषणोंसे अलंकृत सूर्यनारायणकी सोनेकी मूर्ति स्थापित करे। रथके आगे उनके सारथिको बैठाये। अनन्तर बारह ब्राह्मणोंमें बारह महीनोंके सूर्योंकी भावना कर तेरहवें मुख्य आचार्यको साक्षात् सूर्यनारायण समझकर उनकी पूजा करे तथा उन्हें रथ, छत्र, भूमि, गौ आदि समर्पित करे। इसी प्रकार रत्नोंके आभूषण, वस्त्र, दक्षिणा और एक-एक घोड़ा उन बारह ब्राह्मणोंको दे तथा हाथ जोड़कर यह प्रार्थना करे—‘ब्राह्मण देवताओ! इस सूर्यव्रतके उद्यापन करनेके बाद यदि असमर्थतावश कभी सूर्यव्रत न कर सकूँ तो मुझे दोष न हो।’ ब्राह्मणोंके साथ आचार्य भी ‘एवमस्तु’ ऐसा कहकर यजमानको आशीर्वाद दे और कहे—‘सूर्यभगवान् तुमपर प्रसन्न हों। जिस मनोरथकी पूर्तिके लिये तुमने यह व्रत किया है और भगवान्
- प्रायः अन्य सभी पुराणोंमें चैत्रादि बारह महीनोंमें सूर्यके ये नाम मिलते हैं—धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान्, पृषा, पर्जन्य, अंश, भग, त्वष्टा और विष्णु। कल्पभेदके अनुसार नामोंमें भेद है।
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