भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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भोजप्रबन्धः ६३ 'जानुदघ्न' कहने पर संतुष्ट हुए भोजराज ने लाख, लाख और फिर लाख मुद्राएँ और दस मदमत्त हाथी दिये।' ततः सिंहासनमलङ्कुर्वाणे श्रीभोजनृपतौ द्वारपाल आगत्य प्राह- 'राजन् कोऽपि शुकदेवनामा कश्चिद्दारिद्र्यविडम्बितो द्वारि वर्तते' । राजा बाणं प्राह- 'पण्डितवर, सुकवे, तत्त्वं विजानासि ।' बाणः- 'देव, शुकदेवपरिज्ञानासामर्थ्याभिज्ञः कालिदास एव, नान्यः।' राजा- 'सुकवे, सखे कालिदास, किं विजानासि शुकदेवकविम् ।' इत्याह- एक बार नरपति श्री भोजराज सिंहासन को सुशोभित कर रहे थे कि द्वारपाल आकर बोला- 'महाराज, दरिद्रता की विडंबना में पड़ा कोई शुकदेव नाम का पंडित द्वार पर उपस्थित है।' राजा ने बाण से कहा- 'पंडितवर, सुकवे, तुम शुकदेव की विद्वत्ता जानते हो?' बाण ने कहा- 'देव, शुकदेव को पूर्णतया जानने वाला कालिदास ही है, अन्य नहीं।' राजा ने पूछा- 'सुकवि मित्र कालिदास, तुम शुकदेव कवि को जानते हो ?' कालिदासः- 'देव, सुकविद्वितयं जाने निखिलेऽपि महीतले । भवभूतिः शुकश्चायं वाल्मीकिस्त्रितयोऽनयोः' ॥ १६१ ॥ कालिदास ने कहा- 'देव, संपूर्ण भूतल पर मैं सुकवियों की जोड़ी ( दुगड्डा-जोड़ी ) जानता हूँ- एक भवभूति और यह शुक । इन दोनों का वाल्मीकि के साथ त्रितय ( तिकड़ी ) बनता है।' ततो विद्वद्वृन्दवन्दिता सीता प्राह- 'काकाः किं किं न कुर्वन्ति क्रोङ्कारं यत्र तत्र वा । शुक एव परं वक्ति (१) नृपहस्तो पला लितः' ॥ १६२ ॥ तदनंतर विद्वज्जनों द्वारा पूजित सीता ने कहा - 'जहाँ-तहाँ कौए कितनी काँव-काँव नहीं किया करते ? परन्तु, बोलता राजा के हाथों लाड पाने वाला शुक ही है।' ततो मयूरः प्राह- ( १. ) नृपस्य हस्तेनोपलालितः ।