भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ भोजप्रबन्धः 'अपृष्टस्तु नरः किञ्चिद्यो ब्रूते राजसंसदि । न केवलमसम्मानं लभते च विडम्बनाम् ॥ १६३ ॥ तब मयूर ने कहा-- 'जो राजसभा में बिना पूछे जाने पर बोलता है, वह केवल असम्मान ही नहीं पाता, उपहसित भी होता है। देव, तथाप्युच्यते-- का सभा किं कविज्ञानं रसिकाः कवयश्च के । भोज किं नाम ते दानं शुकस्तुष्यति येन सः ॥ १६४ ॥ तथापि भवनद्वारमागतः शुकदेवः सभायामानेतव्य एव ।' महाराज, तथापि कहता हूँ- भोजराज, क्या तो आपकी सभा है और क्या कविज्ञान है और रसिक कवि ही क्या हैं ? आपका दान भी क्या है, जिससे वह शुक संतुष्ट होगा ? तो भी महल के द्वार पर आये शुकदेव को सभा में लाना ही चाहिए। तदा राजा विचारयति शुकदेवसामर्थ्यं श्रुत्वा हर्षविषादयोः पात्र- मासीत् । महाकविरवलोकित इति हर्षः । अस्मै सत्कविकोटिसुकुटमणये किं नाम देयमिति च विषादः । 'भवतु । द्वारपाल, प्रवेशय ।' तो राजा ने सोचा, शुकदेव के सामर्थ्य को सुनकर प्रसन्नता और दुःख- दोनों का अनुभव हुआ । महाकवि को देखा-इसकी प्रसन्नता और श्रेष्ठकवि मंडल के मुकुट मणि स्वरूप इसे दिया क्या जायगा-इसका दुःख । जो हो । द्वारपाल, कवि को भीतर लाओ, ( राजा ने आज्ञा दी ) । तत आयान्तं शुकदेवं दृष्ट्वा राजा सिंहासनादुदतिष्ठत् । सर्वे पण्डितास्तं शुकदेवं प्रणम्य सविनयमुपवेशयन्ति । स च राजा तं सिंहा- सन उपवेश्य स्वयं तदाज्ञयोपविष्टः । फिर शुकदेव को आता देख राजा सिंहासन से उठ खड़ा हुआ । सब पंडित उस शुकदेव को प्रणाम करके विनय पूर्वक आसन देने लगे । राजा उसे सिंहासन पर बैठा कर स्वयम् उसकी आज्ञा से बैठा । ततः शुकदेवः प्राह- 'देव, धाराराथ, श्रीविक्रमनरेन्द्रस्य या दान- लक्ष्मीस्त्वामेव सेवते । देव, मालवेन्द्र एव धन्यः नान्ये नभुजः, यस्य ते