भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 190 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 102

भोजप्रबन्धः ६५ कालिदासाद्यो महाकवयः सूत्रबद्धाः पक्षिण एव निवसन्ति।' ततः पठति-- 'प्रतापभीत्या भोजस्य तपनो मित्रतामगात् । और्वो वाडवतां धत्ते तडिङ्क्षणिकतां गता' ॥ १६५ ॥ तदनंतर शुकदेव ने कहा--'महाराज, धारा के अधिपति, श्रीविक्रम महाराज की जो दान लक्ष्मी है वह आपकी ही सेवा कर रही है। देव, धन्य केवल आप मालवाधिपति ही हैं, जिन आपके यहाँ कालिदास आदि महाकवि डोरी में बँधे पक्षियों की भाँति निवास करते हैं--अन्य धरती को भोगने वाले राजा नहीं। फिर पढ़ा-- भोज के प्रताप से डरकर तपनशील सूर्य 'मित्र' (सूर्य का अपर पर्याय तथा सखा) बन गया, 'और्व' (च्यवन-पौत्र अर्चिःस्वरूप तेजस्वी भृगुकृषि जिन्होंने कालांतर में सगर को अग्नेयास्त्र दिया-तथा सागर में रहने वाली वडवाग्नि) ने वडवाग्नि का रूप लिया और बिजली क्षणभर चमकने वाली बन गयी (चंचला)। राजा--'तिष्ठ सुकवे, नापरः श्लोकः पठनीयः।' 'सुवर्णकलशं प्रादाद्दिव्यमाणिक्यसम्भृतम् । भोजः शुकाय सन्तुष्टो दन्तिनश्च चतुःशतम्' ॥ १६६ ॥ इति पुण्यपत्रे लिखित्वा सर्वं दत्त्वा कोषाधिकारी शुकं प्रस्थापयामास। राजा स्वदेशं प्रतिगतं शुकं ज्ञात्वा तुतोष। सा च परिषद्सन्तुष्टा। राजा ने कहा--'हे सुकवि, रुकिये, दूसरा श्लोक न पढ़िए।' 'संतुष्ट भोज ने अलौकिक मणियों से परिपूर्ण स्वर्ण कलश और चार सौ दंती हाथी शुक को दिये।'--यह पुण्यपत्र पर लिख कर और सब कुछ देकर कोषाधिकारी ने शुक को विदा किया। शुक अपने देश चला गया-यह जानकर राजा को तुष्टि हुई। --:०:-- १३-भोजस्य काव्यानुरागः कतिपयकथा अन्यथा वर्षाकाले वासुदेवो नाम कविः कश्चिदागत्य राजानं दृष्ट- वान्। राजाह--'सुकवे, पर्जन्यं पठ।' अतः कविराह- (१) धुरि साधुः धौरेयः।

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास) · पृष्ठ 102, कुल 190 में से · BharatKosha