भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ भोजप्रबन्धः 'नो चिन्तामणिभिर्न कल्पतरुभिर्नो कामधेन्वादिभि- र्नो देवैश्च परोपकारनिरतैः स्थूलैर्न सूक्ष्मैरपि । अम्भोदेह निरन्तरं जलभरैस्तामुर्वरां सिञ्चतां (१)धौरेयेण धुरं त्वयाद्य बहता मन्ये जगज्जीवति ॥१६७॥ राजा लक्षं ददौ। दूसरी बार वर्षा ऋतु में एक वासुदेव नामक कवि ने आकर राजा का दर्शन किया। राजा ने कहा-'हे सुकवि, मेघ पर पढ़ो।' तो कवि ने कहा- आज यह जगत् न तो चिंतामणियों, न कल्पवृक्षों और न कामधेनु आदि के कारण जीवित है और न परोपकार में संलग्न बड़े-छोटे अन्य देवों के कारण, हे जलदाता यह जीवित है निरंतर जल धाराओं में इस धरती को सींचकर उर्वरा बनाते धुराधारी तेरे धुरा को धारण करने के कारण। राजा ने लाख मुद्राएँ दीं। कदाचिद्राजानं निरन्तरं दीयमानमालोक्य मुख्यमात्यो वक्तुम- शक्तो राज्ञः शयनभवनभित्तौ व्यक्तान्यक्षराणि लिखितवान्- 'आपदर्थं धनं रक्षेत्' राजा शयनादुत्थितो गच्छन्भित्तौ तान्यक्षराणि वीक्ष्य स्वयं द्वितीय- चरणं लिलेख-श्रीमन्तामापदः कुतः। अपरेद्यु रमात्यो द्वितीय चरणं लिखितं दृष्ट्वा स्वयं तृतीयं लिलेख- 'सा चेदपगता लक्ष्मीः' परेद्यु राजा चतुर्थं चरणं लिखति-'सञ्चितार्थो विनश्यति' ॥ १६८॥ ततो मुख्यमात्यो राज्ञः पादयोः पतति--'देव, क्षन्तव्योऽयं ममा- पराधः। एक बार राजा को निरन्तर दान करते देख कुछ मुँह से कहने में असमर्थ मुख्य मंत्री ने राजा के शयन गृह की दीवार पर स्पष्ट अक्षरों में लिख दिया- 'आपत्काल निमित्त उचित है धन की रक्षा।' सोकर जागे सजा ने जाते हुए दीवार पर उन अक्षरों को देखकर स्वयं दूसरा चरण लिखा-'श्रीमन्तों पर भला कहाँ आपत् आती है?'