भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

१०० भोजप्रबन्धः र्भवति । परमनेन न कदापि वीक्षितास्ति राजसभा । यतो दारिद्र्य- वारिधिरयम् । अस्य च जीर्णमपि कौपीनं नास्ति ।' ततो राजा सोम- नाथं प्राह-- 'निरवद्यानि पद्यानि यद्यनाथस्य का क्षतिः । भिक्षुणा कक्षनिक्षिप्तः किमिच्छुर्नीरसो भवेत्' ॥ २०३ ॥ ततः सर्वेभ्यस्ताम्बूलं दत्त्वा राजा सभाया उदतिष्ठत् । उस क्षण जिससे प्रतिद्वन्द्विता न हो सके, ऐसी उसकी कविता सुनकर सोमनाथ नाम के कवि का मुँह उतर गया । और वह दुष्टतापूर्वक राजा से बोला--'महाराज, यह कवि तो अच्छा है, पर इसने कभी राज सभा नहीं देखी है, क्योंकि यह दरिद्रता का समुद्र है । इसके पास तो फटा-पुराना कौपीन तक नहीं है ।' तब राजा ने सोमनाथ से कहा-- यदि किसी निःसहाय का काव्य श्रेष्ठ है, तो इसमें हानि क्या है ? भिखारी की काँख में रखा गन्ना कहीं नीरस होता है ? फिर सब को पान देकर राजा सभा से उठ गया । ततः सर्वैरप्यन्योन्यमित्यभ्यधायि--'अद्य विष्णुकवेः कवित्वमाकर्ण्य सोमनाथेन सम्यग्दौष्ट्यमकारि ।' ततः समुत्थिता विद्वत्परिषत् । ततो विष्णुकविरेकं पद्यं पत्रे लिखित्वा सोमनाथकविहस्ते दत्त्वा प्रणम्य गन्तु- मारभत । 'अत्र सभायां त्वमेव चिरं नन्द ।' तब सब परस्पर कहने लगे--'आज विष्णु कवि की कविता सुनकर सोमनाथ ने बड़ी दुष्टता की ।' इसके बाद विद्वत्-सभा उठायी । तब विष्णु कवि ने एक पद्य पत्र पर लिख कर सोमनाथ कवि के हाथ में दिया और प्रणाम करके जाने लगा--'यहाँ सभा में तुम्हीं चिरकाल तक सानंद रहो ।' ततो वाचयति सोमनाथकविः-- 'एतेषु हा तरुणमारुतधूयमान- दावानलैः कवलितेषु महीरुहेषु । अम्भो न चेज्जलद मुञ्चसि मा विमुञ्च वज्रं पुनः क्षिपसि निर्दय कस्य हेतोः' ॥ २०४ ॥ ततः सोमनाथकविर्निखिलमपि पट्टदुकूलवित्त हिरण्मयीं तुरङ्गमादि- संपत्तिं कलत्रवस्त्रावशेषं दत्तवान् ।