भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः १०१ तब सोमनाथ कवि ने उसे वांचा-- प्रवल वायु के द्वारा भड़कार्या जाती दावाग्नि के ग्रास लग गये इन वृक्षों पर हे जलद, यदि तुम पानी नहीं बरसाते तो न बरसाओ, किंतु हे निर्दय, इन पर वज्र किस लिए गिराते हो ? तो सोमनाथ कवि ने पत्नी और देह वस्त्र मात्र शेष रख कर, रेशमी वस्त्र, धन, स्वर्ण और अश्व आदि संपूर्ण संपत्ति विष्णु कवि को दे डाली। ततो राजा मृगयारसप्रवृत्तो गच्छंस्तं विष्णुकविमालोक्य व्यचिन्त- यत्-मयास्मै भोजनमपि न प्रदत्तम् । मामनादृत्यायं सम्पत्तिपूर्णः स्वदेशं प्रति यास्यति । पृच्छामि । 'विष्णुकवे, कुतः सम्पत्तिः प्राप्ता ।' कविराह-- सोमनाथेन राजेन्द्र देव तद्गृहभिक्षुणा । अद्य शोच्यतमे पूर्णे मयि कल्पद्रुमायितम् ।। २०५ ।। तदनंतर आखेट के निमित्त जाते राजा ने उस विष्णु कवि को देख कर विचार किया-'मैंने तो इसे भोजन भी नहीं दिया। मेरा अनादर करके संपत्ति से भरा पूरा हो यह अपने देश चला जायेगा पूछता हूँ। हे विष्णु कवि, संपत्ति कहाँ से पा ली ?' कवि बोला-- हे राजेश्वर, महाराज, आपके घर के भिक्षुक सोमनाथ ने आज मुझ दीन तम व्यक्ति पर पूर्णतः कल्पवृक्ष की भाँति कृपा की । राजा पूर्व सभायां श्रुतस्य श्लोकस्याक्षरलक्षं ददौ। सोमनाथेन च यावद्दत्तं तावदपि सोमनाथाय दत्तवान् । सोमनाथः प्राह- 'किसलयानि कुतः कुसुमानि वा क्व च फलानि तथा वनवीरुधाम् । अयमकारणकारुणिको यदा न तरतीह पयांसि पयोधरः ॥२०६॥ राजा ने पहिले सभा में सुने श्लोक पर प्रत्यक्षर लक्ष मुद्राएँ दी और सोमनाथ ने जितना दिया था, उतना सोमनाथ को भी दिया। सोमनाथ बोला- वन के वृक्षों ने कहाँ से तो पत्ते आते और कहाँ से फूल और फल, यदि विना कारण के करुणा करने वाला यह जल धर इन्हें जल से तर न कर देता ?