भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 11

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भोजप्रबन्धः ३ तदनंतर कुछ दिनों पश्चात् राजसभा में ज्योतिःशास्त्र में पारंगत, समस्त विद्याओं के कौशल से संपन्न एक ब्राह्मण आया और राजा के प्रति कल्याण-वचन कहके बैठ गया तथा राजा से बोला—‘देव, यह संसार मुझे सर्वज्ञ कहता है, सो ( आप भी इच्छानुसार ) कुछ पूछिए :— जो विद्या कंठस्थ हो, बुद्धिमानों को सदा उसे प्रकाशित करना उचित होता है; जो विद्या गुरु अथवा पुस्तक में ही स्थित है, उससे मूर्ख को ही ठगा जा सकता है । ( अथवा पुस्तकस्थ या गुरुस्थित विद्या से विद्वत्ता का अभिमानी बना मनुष्य मूर्ख होता है और धोखा खाता है । ) ततो राजापि विप्रस्याहम्भावमुद्रया चमत्कृतां तद्वार्तां श्रुत्वा ‘अस्माकं जन्मारभ्यैतत्क्षणपर्यन्तं यद्यन्मयाचरितं यद्यत्कृतं तत्तत्सर्वं वदसि यदि, भवान्सर्वज्ञ एव’ इत्युवाच । ततो ब्राह्मणोऽपि राज्ञा यद्यत्कृतं तत्तत्सर्वमुवाच । गूढव्यापारमपि । ततो राजापि सर्वाण्यप्यभिज्ञानानि ज्ञात्वा तुतोष । पुनश्च पञ्चषट्पदानि गत्वा पादयोः पतित्वेन्द्रनील- पुष्परागमरकतवैडूर्यखचितसिंहासन उपवेश्य राजा प्राह— ‘मातेव रक्षति पितेव हिते नियुङ्क्ते कान्तेव चाभिरमयत्यपनीय खेदम् । कीर्तिं च दिक्षु विमलां वितनोति लक्ष्मीं किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या’ ॥ ५ ॥ ततो विप्रवराय दशाश्वान् (?) जानेयान् ददौ । तत्पश्चात् ब्राह्मण की अहंकार युक्त मुद्रा से चमत्कारमयी उस वाणी को सुनकर राजा ने भी कहा—“जन्म से लेकर इस क्षण तक जो-जो आचरण और जो-जो कार्य मेरे द्वारा हुए हैं, वे सब यदि आप बता देंगे तो मैं भी आपको सर्वज्ञ समझूँगा ।” तब राजा ने जो-जो किया था, वह सब—यहाँ तक कि गुप्त रूप से किया कार्यभी—ब्राह्मण ने बता दिया । राजा भी समस्त श्रेय बातों को जान कर संतुष्ट हुआ और फिर पाँच-छः डग आगे बढ़ ब्राह्मण के चरणों में प्रणिपात करके नीलम, पुखराज, पन्ना और वैडूर्य ( १ ) ये कुलीनाः प्रशस्तजातिभवा अश्वास्ते आजानेयाः । आजेन क्षेपणीयाः प्रापणीया इति विग्रहः ।