भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Page 4] [Heading] भोजप्रबन्धः
मणियों से जड़े सिंहासन पर ( उसे ) बैठाकर बोला- "माता के सदृश रक्षा करती है, पिता के समान कल्याण करने वाले कार्यों में नियुक्त करती है और प्रिय पत्नी के तुल्य खिन्नतां को दूर कर प्रसन्न करती है। चारों दिशाओं में विमल कीर्ति और लक्ष्मी का विस्तार करती है-कल्पलता के समान विद्या क्या-क्या सिद्ध नहीं कर देती?" और विप्रवर को दस उत्तम जाति के घोड़े दिये। ततः सभायामासीनो बुद्धिसागरः प्राह राजानम्—'देव, भोजस्य जन्मपत्रिकां ब्राह्मणं पृच्छ' इति । ततो मुञ्जः प्राह - 'भोजस्य जन्म- पत्रिकां विधेहि' इति । ततोऽसौ ब्राह्मण उवाच - 'अध्ययनशालाया भोज आनेतव्यः' इति । मुञ्जोऽपि ततः कौतुकादध्ययनशालामलङ्कुर्वाणं भोजं भटैरानयामास । ततः साक्षात्पितरमिव राजानमानम्य सविनयं तस्थौ । तदनंतर सभा में बैठा बुद्धिसागर राजा से बोला- 'देव, भोज की जन्मपत्रिका ब्राह्मण से विचारवाइए ।' तब मुंज ने कहा- 'भोज की जन्मपत्री विचारिए ।' तब ब्राह्मण बोला- 'पाठशाला से भोज को बुलवाइए ।' कौतुक के कारण मुंज ने भी पाठशाला में सुशोभित भोज को भटों द्वारा बुलवा लिया । साक्षात् पिता के समान राजा को प्रणाम करके विनय पूर्वक भोज बैठ गया । ततस्तद्रूपलावण्यमोहिते राजकुमारमण्डले प्रभूतसौभाग्यं महीमण्ड- लमागतं महेन्द्रमिव, साकारं मन्मथमिव, मूर्तिमत्सौभाग्यमिव, भोजं निरूप्य राजानं प्राह दैवज्ञः- 'राजन्, भोजस्य भाग्योदयं वक्तुं विरि- ञ्चिरपि नालम्, कोऽहमुदरम्भरिर्ब्राह्मणः । किञ्चित्तथापि वदामि स्व- मत्यनुसारेण । भोजमितोऽध्ययनशालायां प्रेषय ।' ततो राजाज्ञया भोजे ह्यध्ययनशालां गते विप्रः प्राह- 'पञ्चाशत्पञ्चवर्षाणि सप्तमासदिनत्रयम् । भोजराजेन भोक्तव्यः सगौडो दक्षिणापथः' ॥ ६ ॥ इति । तत्तदाकर्ण्य राजा चातुर्याद्दर्पंहसन्निव सुमुखोऽपि