भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

१२२ भोजप्रबन्धः पुनरपि पठति कविः- केचिन्मूलाकुलाशाः कतिचिदपि पुनः स्कन्धसम्बन्धभाज- श्छायां केचित्प्रपन्नाः प्रपदमपि परे पल्लवानुञ्जयन्ति। अन्ये पुष्पाणि पाणौ दधति तदपरे गन्धमात्रस्य पात्रं वाग्वल्ल्याः किन्तु मूढाः फलमहह नहि द्रष्टुमप्युत्सहन्ते ॥२४३॥ कवि ने फिर पढ़ा- कुछ लोग वृक्ष की जड़ के लिए व्याकुल रहते हैं, कुछ तने को लेना चाहते हैं; कुछ छाया का ही ग्रहण करते हैं, कुछ पत्तों को तोड़ लेते हैं; कुछ अन्य फूलों को हाथों में धारण कर लेते हैं और कुछ गंधमात्र के पात्र बनते हैं; किंतु, हाय, ये मूर्ख वाणी रूपी वल्लरी के फलों को देखने के लिए भी उत्साहित नहीं होते । एतदाकर्ण्य बाणः प्राह- परिच्छन्नस्वादोऽमृतगुडमधुक्षौद्रपयसां कदाचिच्चाभ्यासाद्व्रजति ननु वैरस्यमधिकम्। प्रियाविम्बोष्ठे वा रुचिरकविवाक्येऽप्यनवधि- र्नवानन्दः कोऽपि स्फुरति तु रसोऽसौ निरुपमः ॥२४४॥ ततो राजा लक्षं दत्तवान् । यह सुनकर बाण ने कहा- अमृत, गुड़, मधु, छुहारे और दूध का स्वाद एक तो स्पष्ट नहीं है दूसरे वार-वार प्रयोग से कभी-कभी पर्याप्त विरस भी हो जाता है; किंतु प्रिया के विम्बोष्ठ और रमणीय कवि वचन में एक असीम नवीन आनंद है, उससे तो एक निरुपमेय रस का स्फुरण होता है । तो राजा ने लाख मुद्राएँ दीं । ---:०:--- (११) कालिदासभवभूत्योः स्पर्धा ततः कदाचित्सिंहासनमलङ्कुर्वाणे श्रीभोजे द्वारपाल आगत्य प्राह- 'देव, वाराणसीदेशादागतः कोऽपि भवभूतिर्नाम कविर्द्वारि तिष्ठति'