भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंइति। राजा प्राह—'प्रवेशय' इति। ततः प्रविष्टः सोऽपि सभामगात्। ततः सभ्याः सर्वे तदागमनेन तुष्टा अभवन्। राजा च भवभूतिं प्रेक्ष्य प्रणमति स्म। स च 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा तदाज्ञयोपविष्टः। एक बार श्रीभोज के सिंहासन को सुशोभित करने पर द्वारपाल ने आकर कहा—'देव, वाराणसी देश से आया एक भवभूति नामक कवि द्वार पर उपस्थित है।' राजा ने कहा—'प्रविष्ट कराओ।' सो प्रविष्ट होने पर वह भी सभा में पहुँचा। तब सभी सभासद् उसके आने से संतुष्ट हुए। राजा ने भवभूति को देख कर प्रणाम किया। वह 'स्वस्ति' कहकर उसकी आज्ञा से बैठ गया। भवभूतिः प्राह—'देव, नानीयन्ते मधुनि मधुपाः पारिजातप्रसूनै- र्नाभ्यर्थ्यन्ते तुहिनरुचिनश्चन्द्रिकायां चकोराः। अस्मद्वाङ्माधुरीमधुरसापद्यपूर्वावताराः सोल्लासाः स्युः स्वयमिह बुधाः किं मुधाभ्यर्थनाभिः॥२४५॥ भवभूति ने कहा—महाराज, भौंरे मधु पर पारिजात (कल्प वृक्ष) के फूलों द्वारा नहीं लाये जाते; शीतल कांति चंद्रमाकी चाँदनी के निमित्त चकोरों की अभ्यर्थना नहीं की जाती (ये स्वयं ही आकृष्ट होते हैं।) इसी प्रकार मेरी वाणी की माधुरी के मिठास को प्राप्त कर पहिले से यहाँ पधारे विद्वज्जन स्वयं ही उल्लसित हो जायेंगे—व्यर्थ अभ्यर्थना करने से क्या लाभ ? नास्माकं शिविका न कापि कटकाचालङ्क्रियासत्क्रिया नोत्तुङ्कस्तुरगो न कश्चिदनुगो नैवाम्बरं सुन्दरम्। किन्तु क्ष्मातलवर्त्यशेषविदुषां साहित्यविद्याजुषां चेतस्तोषकरी शिरोनतिकरी विद्या नवद्यास्ति नः॥२४६॥ हमारे पास न तो पालकी है, न सत्कार के लिए सुसज्जित मुलायम बिछौना; न ऊँचा घोड़ा है, न कोई अनुचर और न सुन्दरवस्त्र; किंतु धरती पर विद्यमान समस्त साहित्यविद्या के ज्ञाता विद्वानों के चित्त को सन्तुष्ट करने वाली और उनके शिर को विनत करने वाली श्रेष्ठ विद्या है।