भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 129, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ भोजप्रबन्धः चंद्रमंडल (मुख) खिन्न हो गया; माला से ग्रथित अंधकार बिखर गया (पुष्पमाल से युक्त केशराशि बिखर गयी); पहिले खिलते केतक-पुष्प की कोर की लीला करने वाली सुंदर मुसकान शांत हो गयी, कुंडलों का नृत्य समाप्त हो गया, कुवलयों का जोड़ा (दोनों नेत्र) मुंद गया और प्रवालों (ओष्ठों) से सी-सी करना बंद हो गया--तत्पश्चात् न जाने क्या हुआ ? राजा कालिदासं प्राह--'सुकवे, भवभूतिना सह साम्यं तव न वक्तव्यम्।' भवभूतिराह--'देव, किमिति वारयसि।' राजा--'सर्व- प्रकारेण कविरसि।' ततो बाणः प्राह--'राजन्, भवभूतिः कविश्चेत् कालिदासः किं वक्तव्यः राजा--'बाणकवे, कालिदासः कविर्न। किन्तु पार्वत्याः कश्चिदवनौ पुरुषावतार एव।' ततो भवभूतिराह--'देव, किमत्र प्राशस्त्यं भाति।' राजा प्राह--'भवभूते, किमु वक्तव्यं प्राशस्त्यं कालि- दासश्लोके। यतः 'केतकशिखालीलायितं सुस्मितम्' इति पठितम्।' ततो भवभूतिराह--'देव, पक्षपातेन वदसि' इति। ततः कालिदासः प्राह--'देव अपख्यातिर्मा भूत्। भुवनेश्वरीदेवालयं गत्वा तत्सन्निधौ तां पुरस्कृत्य घटे संशोधनीय त्वया।' राजा ने कालिदास से कहा--'हे सुकवि, भवभूति के साथ तुम्हारी समता अवचनीय है।' भवभूति ने कहा--'महाराज, क्यों निवारण करते हैं?' राजा--'तुम सब प्रकार से कवि हो।' तो बाण ने कहा--'राजन्, यदि भवभूति कवि है, तो कालिदास को क्या कहा जाय ?' राजा--'कवि बाण, कालिदास कवि नहीं है, अपितु धरती पर पार्वती का एक पुरुषावतार ही है।' तो भवभूति ने कहा--'महाराज, इसमें प्रशंसनीय क्या प्रतीत होता है?' राजा ने कहा--'भवभूति, कालिदास के श्लोक की प्रशंसनीयता के विषय में कहना क्या? क्या कहा है--'केतक-पुष्प की कोर की लीला करने वाली सुंदर मुसकान' ! तो भवभूति ने कहा--'महाराज, पक्षपात पूर्ण कहते हैं?' तो कालिदास ने कहा--'महाराज, अपकीर्ति न हो। भुवनेश्वरी देवी के मंदिर में जाकर उसके निकट कविता को रखकर आप घट द्वारा परीक्षण करें।' ततो भोजः सर्वकविवृन्दपरिवृतः सन्भुवनेश्वरीदेवालयं प्राप्य तत्र तत्सन्निधौ भवभूतिहस्ते घटं दत्त्वा श्लोकद्वयं च तुल्यपत्रद्वये लिखित्वा