भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः १२७ तुलायां सुमोच । ततो भवभूतिभागे लघुत्वोद्भूतामीषदुन्नतिं ज्ञात्वा देवी भक्तपराधीना सदसि तत्परिभवो मा भूदिति स्वावतंसकह्लारमकरन्दं वामकरनखाग्रेण गृहीत्वा भवभूतिपत्रे चिक्षेप । तो फिर समस्त कवि मंडली के साथ भोज भुवनेश्वरी देवी के मंदिर पहुँचे और उनके सान्निध्य में भवभूति के हाथ में घट देकर और दोनों श्लोक दो समान पत्रों पर लिखकर तराजू में रख दिये । तब फिर भवभूति वाले भाग को हलकेपन के कारण कुछ ऊँचा उठा देख भक्त के अधीन देवी ने यह विचार कर कि मेरे भक्त भवभूति की सभा में अप्रतिष्ठा न हो, अपने कर्ण फूल के कमल की मकरंद बायें हाथ के नख की कोर से लेकर भवभूति के (श्लोक वाले) पत्र में डाल दीं । ततः कालिदासः प्राह- 'अहो मे सौभाग्यं मम च भवभूतेश्च भणितं घटायामारोप्य प्रतिफलति तस्यां लघिमनि । गिरां देवी सद्यः श्रुतिकलितकह्लारकलिका- मधूलीमाधुर्यं क्षिपति परिपूर्त्यै भगवती' ॥ २४३ ॥ तो कालिदास ने कहा-- अहा, मेरा सौभाग्य है कि मेरी और भवभूति की काव्योक्ति को तुला में रखने पर भवभूति की उक्ति में जब हलकापन आने लगा तो उसकी पूर्ति के लिए भगवती वाग्देवी ने तुरंत कान में पहिनी कमल कली के मकरंद के माधुर्य को रख दिया । ततः कालिदासपाद्योः पतति भवभूतिः । राजानं च विशेषज्ञं मनुते स्म । ततो राजा भवभूतिकवये शतं मत्तगजान्ददौ । तब भवभूति कालिदास के पैरों पड़ गये और राजा को विशेषज्ञ मान लिया । तो राजा ने भवभूति कवि को सौ मतवाले हाथी दिये । ---:०:--- (२०) दानस्य कतिपयकथाः अन्यदा राजा धारानगरे रात्रावेकाकी विचरन्काञ्चन स्वैरिणीं सङ्केतं गच्छन्तीं दृष्ट्वा पप्रच्छ—'देवि, का त्वम्। एकाकिनी मध्यरात्रौ क्व गच्छसि' इति ।