भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 131, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें[Page 128] भोजप्रबन्धः
एक बार धारा नगर में एकाकी विचरण करते राजा ने एक स्वेच्छा विहारिणी को संकेत-स्थल (पूर्व निश्चित मिलन स्थान) की ओर जाती देख पूछा—'हे देवी, तुम कौन हो? आधी रात में अकेली कहाँ जा रही हो?' ततश्चतुरा स्वैरिणी सा तं रात्रौ विचरन्तं श्रीभोजं निश्चित्य प्राह— 'त्वत्तोऽपि विषमो राजन्विषमेषुः क्ष्मापते । शासनं यस्य रुद्राद्या दासखन्मूर्ध्नि कुर्वते ॥ २५४ ॥ ततस्तुष्टो राजा दोर्दण्डादादायाङ्गदं वलयं च तस्यै दत्तवान्। सा च यथास्थानं प्राप । तो वह चतुर इच्छाचारिणी यह निश्चय करके कि यह रात में विचरण करता राजा भोज है, उससे बोली— हे धरती के स्वामी राजा, विषमबाण (पंचबाण कामदेव) आपसे भी अधिक उग्र है, जिसके शासन को रुद्रादि देव दास के समान शिरोधार्य करते हैं। संतुष्ट हो राजा ने भुजदंड से बाजूबंद और कंगन उसे दिये। और वह भी अपने निश्चित स्थान को चली गयी। ततो वर्त्मनि गच्छन्क्वचिद्गृह एकाकिनीं रुदतीं नारीं दृष्ट्वा 'किम- र्थमर्धरात्रौ रोदिति। किं दुःखमेतस्याः।' इति विचारयितुमेकमङ्गरक्ष- कंप्राहेिणोत्। तदनंतर मार्ग में जाते हुए किसी घर में एक अकेली स्त्री को रोती देख—'यह आधी रात को क्यों रो रही है? इसको क्या दुःख है?—यह विचारने के लिए एक अंगरक्षक को भेजा। ततोऽङ्गरक्षकः पुनरागत्य प्राह—'देव, मया पृष्टा यदाह तच्छृणु— वृद्धोमत्पतिरेष मञ्चकगतः स्थूणावशेषं गृहं कालोऽयं जलदागमः कुशलिनो वत्सस्य वार्तापि नो । यत्नात्सञ्चिततैल बिन्दु घटिका भग्नेति, पर्याकुला दृष्ट्वा गर्भभरालसां निजवधूं श्वश्रूश्चिरं रोदिति ॥ २५५ ॥ ततः कृपावारिधिः क्षोणीपालस्तस्यै लक्षं ददौ।