भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः १२६ तो लौटकर अंगरक्षक बोला—'महाराज, मेरे पूछने पर उसने जो कहा, सो सुनिए— 'यह मचिया पर पड़ा, बूढ़ा मेरा पति है; यह मेरा घर है, जिसमें थूनी- मात्र शेष है; यह वरसाल के आने का समय है और मेरे बच्चे का कोई कुशल समाचार भी नहीं है । प्रयत्न पूर्वक संचित तेल की मटकी भी फूट गयी',—तो अत्यंत व्याकुल हो गर्भ के भार से अलसाती अपनी पुत्र-वधू को देखकर (बूढ़ी) सास बहुत देर से रो रही है । तब कृपा से सागर पृथ्वीपालक ने उसके लिए लाख मुद्राएँ दीं । अन्यदा कोङ्कणदेशवासी विप्रो राज्ञे 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा प्राह— शुक्तिद्वयपुटे भोज यशोऽब्धौ तव रोदसी । मन्ये तदुद्भवं मुक्ताफलं शीतांशुमण्डलम् ॥ २५६ ॥ राजा तस्मै लक्षं ददौ । दूसरी बार कोंकण देश का निवासी एक ब्राह्मण 'राजा का कल्याण हो,' यह कहकर बोला— हे भोज, ये आकाश और धरती तेरे यश-सागर में पड़ी सीपी के दो पुट हैं, मैं मानता हूँ कि यह शीत किरण चंद्रमंडल उसी से उत्पन्न मोती है । राजा ने उसे लाख मुद्राएँ दीं । अन्यदा काश्मीरदेशात्कोऽपि कौपीनावशेषो राजनिटकस्थकवीन्कन- कमांणिक्यपट्टदुकूललङ्कृतानवलोक्य राजानं प्राह— नो पाणौ वरकङ्कणक्वणयतो नो कर्णयोः कुण्डले क्षुभ्यत्क्षीरधिदुग्धमुग्धमहसी नो वाससी भूषणम् । दन्तस्तम्भविकासिका न शिविका नाश्वोऽपि विद्योन्नतो राजन्न्राजसभासुभाषितकलाकौशल्यमेवास्ति नः ॥ २५७ ॥ ततस्तस्मै राजा लक्षं ददौ । एक और बार काश्मीर देश से आया कोई कौपीन मात्र धारी व्यक्ति राजा के समीपवर्ती कवियों को सुवर्ण, माणिक और रेशमी वस्त्रों में सुसज्जित देखकर बोला— ६ भोज०