भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 133

१३० भोजप्रबन्धः सुंदर कंगन खनकाते मेरे हाथ नहीं हैं और न मेरे कानों में कुंडल हैं; न लहराते क्षीर समुद्र के दुग्ध के समान मुग्ध करने वाली शुभ्र कांति वाले वस्त्र हैं और न आभूषण; हाथी दाँत के डंडों से निर्मित न तो पालकी ही है और न खूब ऊँचा घोड़ा;—हे राजा, राजसभा में भली भाँति व्यक्त करने की कला का चातुर्य ही मेरे पास है। तो उसे राजाने लाख मुद्राएँ दीं अन्यदा राजा रात्रौ चन्द्रमण्डलं दृष्ट्वा तदन्तस्थकलङ्क वर्णयति स्म- 'अङ्क' केऽपि शशाङ्किरे जलनिधेः पङ्क' परे मेनिरे सारङ्ग' कतिचिच्च सञ्जगदिरे भूच्छायमैच्छन्परे।' इति राजा पूर्वार्धं लिखित्वा कालिदासहस्ते ददौ। दूसरी बार राजा रात में चंद्रमंडल देखकर उसके भीतर स्थित कालिमा चिह्न का वर्णन करने लगा-- कुछ कलंक की शंका करते, कुछ कहते समुद्र की पंक; कुछ कहते यह हिरन और कुछ धरती की छाया यह अंक। राजा ने इस प्रकार श्लोक का पूर्वार्ध लिखकर कालिदास के हाथ में दे दिया। ततः स तस्मिन्नेव क्षणे उत्तरार्धं लिखति कविः— 'इन्दौ यद्दलितेन्द्रनीलशकलश्यामं दरीदृश्यते। तत्सान्द्रं निशि पीतमन्धतमसं कुक्षिस्यमाचक्ष्महे' ।। २४८ ।। राजा प्रत्यक्षरलक्षमुत्तरार्धस्य दत्तवान्। तो उस कवि ने उसी क्षण उत्तरार्ध लिख दिया— इंद्र नीलमणि-खंड दीखता जो चंदा में काला-सा, सब पिया रात में घना अँधेरा, पड़ा पेट में पाला-सा। राजा ने उत्तरार्ध के लिए प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं। ततो राजा कालिदास-कवितापद्धतिं वीक्ष्य चमत्कृतः पुनराह- 'सखे, अकलङ्क' चन्द्रमसं व्यावर्णय' इति। तो राजा ने कालिदास की काव्य-रचना-प्रणाली को देखकर चमत्कृत हो फिर कहा—'मित्र, निष्कलंक चंद्रमा का वर्णन करो।'