भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः १३१ ततः कविः पठति— 'लक्ष्मीक्रीडातडागो रतिधवलगृहं दर्पणो दिग्वधूनां पुष्पं श्यामालतायास्त्रिभुवनजयिनो मन्मथस्यातपत्रम् । पिण्डीभूतं हरस्य स्मितममरधुनीपुण्डरीकं मृगाङ्को ज्योत्स्नापीयूषवापी नयति सितवृषस्तारकागोलकस्य' ॥ २५६ ॥ राजा पुनः प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। तो कवि ने पढ़ा— लक्ष्मी का क्रीडा-सर चंदा या है रति का शुभ्र निवास, दिग्भामिनियों का या दर्पण, श्यामलत्ता का फूल सुहास, त्रिभुवनजयी काम का छाता, शिव की पिंड भूत मुसकान, यह मृगांक है नील गगन में सुरगंगा के कमल समान, विमल चाँदनी की अमृत से है परिपूर्ण बावड़ी यह, घूम रहा है वृषभ श्वेत ताराओं के मंडल में यह । राजा ने फिर प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं । एकदा कश्चिद्दूरदेशादागतो वीणाकविराह— 'तर्कव्याकरणाध्वनीनधिषणो नाहं न साहित्यवि- न्नो जानामि विचित्रवाक्यरचनाचातुर्यमत्यद्भुतम् । देवी कापि विरञ्चिवल्लभसुता पाणिस्थितवीणाकल- क्वाणाभिन्नरवं तथापि किमपि ब्रूते मुखस्था मम' ॥ २६० ॥ राजा तस्मै लक्षं ददौ । एक वार दूर देश से आये किसी वीणा कवि ने कहा— तर्क, व्याकरण आदि में मेरा बुद्धि-प्रवेश नहीं है और न मैं साहित्य का वेत्ता हूँ; अद्भुत और अनोखी वाक्य-रचना के कौशल को भी मैं नहीं जानता; तो भी विधाता की प्रिय पुत्री कोई देवी अपने हाथ में ली वीणा की मनोहर ध्वनि के समान सुंदर शब्द मेरे मुख में स्थित हो बोलती है । राजा ने उसे लाख मुद्राएँ दीं । बाणस्तस्य सुललितप्रबन्धं श्रुत्वा प्राह—'देव, मातङ्गीमिव माधुरीं ध्वनिविदो नैव स्पृशन्त्युत्तमां व्युत्पत्तिं कुलकन्यकामिव रसोन्मत्ता न पश्यन्त्यमी ।