भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 136

भोजप्रबन्धः १३३ 'अभूत्प्राची पिङ्गा रसपतिरिवापश्य कनकं गतच्छायश्चन्द्रो बुधजन इव ग्राम्यसदसि । क्षणात्क्षीणास्तारा नृपतय इवानुद्यमपरा न दीपा राजन्ते द्रविणरहितानामिव गुणाः' ॥ २६३ ॥ राजा तस्मै प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ । कालिदास—जैसे सोने के योग से रसराज पारद पीला हो जाता है, वैसे ही पूर्व दिशा पीली पड़ गयी; जैसे गँवारों की सभा में विद्वान श्रीहीन हो जाता है, वैसे ही चंद्रमा शोभाहीन हो गया; जैसे अनुद्योगी राजा क्षीण हो जाते हैं, वैसे ही इस क्षण तारे क्षीण हो गये; और जैसे धनहीन व्यक्तियों के गुण प्रतिष्ठित नहीं हो पाते, वैसे ही दीपक अब शोभित नहीं हैं। राजा ने कालिदास को प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं । अन्यदा द्वारपाल आगत्य प्राह—'देव, कापि मालाकारपत्नी द्वारि तिष्ठति' इति । राजाह—'प्रवेशय' इति । ततः प्रवेशिता सा च नमस्कृत्य पठति— 'समुन्नतघनस्तनस्तबकचुम्बितुम्बीफल- क्वणन्मधुरवीणाया विबुधलोकलोलभ्रुवा । त्वदीयमुपगीयते हरकिरीटकोटिस्फुर- त्तुषारकरकन्दलीकिरणपूरगौरं यशः' ॥ २६४ ॥ राजा 'अहो महती पदपद्धतिः' इति तस्याः प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ । अन्य बार द्वारपाल आकर बोला—'महाराज, कोई मालिन द्वार पर उपस्थित है।' राजा ने कहा—'प्रविष्ट कराओ।' तो प्रविष्ट हो उसने नमस्कार कर पढ़ा— देवलोक की चंचल भ्रूकुटि वाली सुंदरियाँ अत्युन्नत और सघन स्तन- गुच्छों का चुंबन करते तूँबों से युक्त मधुर स्वर देने वाली वीणाओं पर शिव के मुकुटाग्र भाग पर चमकते हिमकर चंद्रमा की किरणों के प्रवाह के समान गौर आपके यश का गान किया करती हैं। राजाने विचारा 'अहा, इसकी पद योजना शैली श्रेष्ठ है'—और उसे प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं।