भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ भोजप्रबन्धः अन्यदा रात्रौ राजा धारानगरे विचरन्कस्यचिद्गृहे कामपि कामि- नीमूलूखलपरायणां ददर्श । राजा तां तरुणीं पूर्णचन्द्राननां सुकुमाराङ्गीं विलोक्य तत्करस्थं मुसलं प्राह--'हे मुसल, एतस्याः करपल्लवस्पर्शनापि त्वयि किसलयं नासीत् । तर्हि सर्वथा काष्ठमेव त्वम्' इति । ततो राजा एकं चरणं पठति स्म- 'मुसल किसलयं ते तत्क्षणाद्यन्न जातम् । और कभी रात मे धारा नगर में विचरते राजा ने किसी घर में किसी कामिनी को ऊखल में कूटते देखा । उस तरुणी के पूर्ण चंद्रमा के समान मुख और सुकुमार अंगों को देखकर राजा ने उसके हाथ के मूसल से कहा--'हे मूसल, इसके कर पल्लव के स्पर्श से भी यदि तुझ में कोंपल नहीं फूटी तो तू सब प्रकार से काठ ही है।' तो राजा ने एक पद पढ़ा-- मूसल, तुझ में यदि फूटी नहीं कोंपल...। ततो राजा प्रातः सभायां समागतं कालिदासं वीक्ष्य 'मुसल किसलयं ते तत्क्षणाद्यन्न जातम्' इति पठित्वा 'सुकवे, त्वं चरणत्रयं पठ' इत्युवाच । तदनंतर प्रातः काल सभा में आये कालिदास को देखकर राजा ने 'मूसल, तुझमें यदि फूटी नहीं कोंपल...' यह पढ़कर उससे कहा 'हे सुकवि, अब तीन शेष पद तुम पढ़ो।' ततः कालिदासः प्राह-- जगति विदितमेतत्काष्ठमेवासि नूनं तदपि च किल सत्यं कानने वर्धितोऽसि । नवकुवलयनेत्रीपाणिसङ्गोत्सवेऽस्मि- न्मुसल किसलयं ते तत्क्षणाद्यन्न जातम् ॥ २६५ ॥ ततो राजा चरणत्रयस्य प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ । तो कालिदास ने कहा-- निश्चय तू काठ है, जानता है यह सारा जग, यह भी फिर सच है कि जंगल में पला है तू, पाणि-संग पाकर भी नवलकमलनयना का मूसल, तुझ में यदि फूटी नहीं कोंपल ! तो राजा ने तीन पदों पर प्रति अक्षर लाख मुद्राएं दीं।