भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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भोजप्रबन्धः १४१ तत आत्मनि राज्ञोऽवज्ञां ज्ञात्वा कालिदासो वल्लालदेशं गत्वा तद्देशाधिनाथं प्राप्य प्राह—'देव, मालवेन्द्रस्य भोजस्यावज्ञया त्वद्देशं प्राप्तोऽहं कालिदासनामा कविः' इति । ततो राजा तमासन उपवेश्य प्राह—'सुकवे, भोजसभाया इहागतैः पण्डितैः समुदितः शतशस्ते महिमा । सुकवे, त्वां सरस्वतीं वदन्ति । ततः किमपि पठ' इति । तो अपने प्रति राजा की उपेक्षा जानकर कालिदास वल्लालदेश चला गया और वहाँ के स्वामी के पास पहुँच बोला—'महाराज, मालव के स्वामी भोज की उपेक्षा के कारण आपके देश में आया मैं कालिदास नामक कवि हूँ।' तो राजा ने उसे आसन पर बैठाकर कहा—'हे सुकवि, भोज की सभा से यहाँ आये पंडितों ने आपके महिमान का शतशः वर्णन किया है। सुकवे, वे आपको सरस्वती कहते हैं सो कुछ पढ़िए।' ततः कालिदास आह— 'वल्लालक्षोणिपाल त्वदहितनगरे सञ्चरन्ती किराती कीर्णान्यादाय रत्नान्युरुतरखदिराङ्गारशङ्काकुलाङ्गी । क्षिप्त्वा श्रीखण्डखण्डं तदुपरि मुकुलीभूतनेत्रा धमन्ती श्वासामोदानुयातैर्मधुकरनिकरैर्धूमशङ्कां विभर्ति' ॥ २७६ ॥ ततस्तस्मै प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ । तो कालिदास ने कहा— हे वल्लाल भूमि के पालक, आपके शत्रुओं के नगर में घूमती किरात स्त्रियाँ बिखरे रत्नों को लेकर और उन्हें बड़े-बड़े कत्थे (खैर) के अंगार समझ व्याकुल हो उन पर चंदन की लकड़ी के टुकड़े रखकर आँखें आधी मूंद कर उन पर फूँकें मारती हैं; उन चंदन गंधी निःश्वासों से खिंचकर उन पर भौरों के समूह आ जाते हैं और किरातीयाँ उन्हें धुआँ समझने लगती हैं। तो राजा ने उन्हें प्रत्येक अक्षर पर लक्ष मुद्राएँ दीं । ततः कदाचिद्वल्लालराजा कालिदासं पप्रच्छ—'सुकवे, एकशिला- नगरीं व्यावर्णय' इति । ततः कविराह— 'अपाङ्गपातैरुपदेशपूर्वैरेणीदृशामेकशिलानगर्याम् । वीथीषु वीथीषु विनापराधं पदे पदे शृङ्खलिता युवानः' ॥२७७॥