भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ भोजप्रबन्धः पुनश्च प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। तदनंतर एक बार बल्लाल नरेश ने कालिदास से कहा - 'हे सुकवि, एक- शिला नगरी का वर्णन करो। तो कवि ने कहा-- एक शिला नगरी में मृगनयनाओं के कूटाघात पूर्वक कटाक्ष करने से गली-गली में तरुण बिना अपराध के ही पग-पग पर श्रृंखलित (जंजीर में बँधे, आकृष्ट) हो जाते हैं। राजा ने फिर से प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं। पुनश्च पठति कविः-- 'अम्भोजपत्रायतलोचनानामम्भोधिदीर्घास्विह दीर्घिकासु । समागतानां कुटिलैरपाङ्गैरनङ्गवाणैः प्रहता युवानः' ॥ २७८ ॥ पुनश्च बल्लालनृपः प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। एवं तत्रैव स्थितः कालिदासः। कवि ने फिर पढ़ा--- समुद्र के सदृश बड़ी-बड़ी (एक शिला की) बावडियों में आयीं कमल- पत्र के समान बड़ी-बड़ी आंखों वाली सुंदरियों के तिरछे कटाक्षों से तरुण- जन काम बाणों से पीडित होते रहते हैं। बल्लाल नरेश ने पुनः प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं। इस प्रकार कालिदास वहीं रहने लगा। अत्रान्तरे धारानगर्यां भोजं प्राप्य द्वारपालः प्राह - 'देव, गुर्जरदेशा- न्माघनामा पण्डितवर आगत्य नगराद्बहिरास्ते; तेन च स्वपत्नी राजद्वारि प्रेषिता।' राजा - 'तां प्रवेशय' इत्याह। ततो माघपत्नी प्रवेशिता। सा राजहस्ते पत्रं प्रायच्छत्। इसी बीच धारा नगरी में भोज के पास पहुँच द्वारपाल ने कहा- 'महाराज, गुजरात देश से माघ नामक पंडितवर आकर नगर के बाहर स्थित है और उन्होंने अपनी पत्नी को राजद्वार पर भेजा है।' राजा ने कहा--'उन्हें प्रविष्ट कराओ।' तो माघ की पत्नी प्रविष्ट करायी गयीं। उन्होंने राजा के हाथ में पत्र दिया। राजा तदादाय वाचयति- "कुमुदवनमपश्रि श्रीमदम्भोजषण्डं त्यजति मुदमुलूकः प्रीतिमांश्चक्रवाकः ।