भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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१४४ भोजप्रबन्धः नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा रिक्तोऽसि यज्जलद सैव तवोत्तमाश्रीः' ॥ २८० ॥ तो माघ पंडित को वस्त्रमात्रधारी जानकर एक याचक ने कहा-- ग्रीष्म ऋतु की गर्मी से तपे पर्वतों को दे आश्वासन, तीक्ष्णदावानल से झुलसे लहलहाकार सब कानन-वन, पूर्ण करके नद-नदी अनेक हुए हो रीते तुम वादल, तुम्हारी यही उत्तमा श्री और शोभा है यही विमल। इत्येतदाकर्ण्य माघः स्वपत्नीमाह--'देवि, अर्था न सन्ति न च मुञ्चति मां दुराशा त्यागे रतिं वहति दुर्ललितं मनो मे । याच्ञा च लाघवकरी स्ववधे च पापं प्राणाः स्वयं व्रजत किं परिदेवनेन ॥ २८१ ॥ यह सुनकर माघ ने अपनी पत्नी से कहा--'देवि, अर्थ नहीं है, पर न छोड़ती मुझे दुराशा, मेरा मन दुर्ललित त्याग का ही प्रेमी है। और याचना छोटा करती; पाप स्ववध में, प्राणों, स्वयं चले जाओ; रोना निष्फल है। दारिद्र्यानलसन्तापः शान्तः सन्तोषवारिणा । याचकाशाविघातान्तर्दाहः केनोपशाम्यति' ॥ २८२ ॥ इति ॥ हुआ दारिद्र्य-अनल का ताप शांत संतोष-शीत जल से याचकों की आशा के घात से हुआ जो है अंतर्दाह, किस तरह होगा वह अब शांत ?' ततस्तदा माघपण्डितस्य तामवस्थां विलोक्य सर्वे याचका यथा- स्थानं जग्मुः । एवं तेषु याचकेषु यथायथं गच्छत्सु माघः प्राह-- 'व्रजत व्रजत प्राणा अर्थिभिर्व्यर्थतां गतैः । पश्चादपि च गन्तव्यं क्व सोऽर्थः पुनरीदृशः' ॥ २८३ ॥ इति विलपन्माघपण्डितः परलोकमगात् । तो माघ पंडित की उस अवस्था को देख उस समय वे सब याचक चले गये। उन याचकों को यथा स्थान जाते देख माघ ने कहा-