भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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१५४ भोजप्रबन्धः तच्चरित्रं दृष्ट्वा राजा गृहं समागत्य प्रातः सभायां कालिदासमालोक्य प्राह—'सुकवे, शृणु— 'दिवा काकरुताद्भीता' ततः कालिदास आह— 'रात्रौ तरति नर्मदाम्' । ततस्तुष्टो राजा पुनः प्राह— 'तत्र सन्ति जले ग्राहाः' ततः कविराह— 'मर्मज्ञा सैव सुन्दरी' ॥ २६६ ॥ ततो राजा कालिदासस्य पादयोः पतति । उसका चरित्र देख घर पहुँच कर राजाने सबेरे सभा में कालिदास को देखकर कहा—'हे सुकवे, सुनो— 'डरती दिन में 'कांव-कांव' से' तो कालिदासने कहा— 'तैर नर्मदा जाती रात ।' तब संतुष्ट हो राजाने फिर कहा— 'पानी में हैं मगर वहाँ तो' तो कवि ने कहा— 'मर्म सुंदरी को सब ज्ञात' तो राजा कालिदास के पैरों-पड़ा । एकदा धारानगरे विचरन्वेश्यावीथ्यां राजा कन्दुकलीलातत्परां तद्भ्र- मणवेगेन पादयोः पतितावतंसां काञ्चन सुन्दरीं दृष्ट्वा सभायामाह— 'कन्दुकं वर्णयन्ते कवयः' इति । एक बार धारानगर में वेश्या-गली में घूमते राजा ने कंदुकक्रीड़ा में लीन और उसके घूमने के वेग से जिसके कान का आभूषण पैरों पर गिर गया था, ऐसी, एक सुंदरी को देखकर सभा में कहा—'कविजन, कंदुक का वर्णन करें।' तदा भवभूतिराह—