भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 158, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः १५५ 'विदितं ननु कन्दुक ते हृदयं प्रमदाधरसङ्गमलुब्ध इव । वनिताकरतामरसाभिहतः पतितः पतितः पुनरुत्पतसि' ॥ २६७ ॥ तो भवभूति ने कहा- हे कंदुक, तुम्हारे हृदय की भावना ज्ञात ही है--तुम सुंदरी के अधर का संग करने के लोभी प्रतीत होते हो, इसी से सुंदरी के कर कमल से ताडित होने पर गिर-गिर कर पुनः पुनः उछलते हो । ततो वररुचिः प्राह- एकोऽपि त्रय इव भाति कन्दुकोऽयं कान्तायाः करतलरागरक्तरक्तः । भूमौ तच्चरणनखांशुगौरगौरः स्वस्थः सन्नयनमरीचिनीलनीलः' ॥ २६८ ॥ तब वररुचि ने कहा- सुंदरी की हथेली की लालिमा से लाल-लाल, धरती पर गिरा होने की अवस्था में उसके चरण-नखों के किरणजाल से शुभ्र और सामान्य स्थिति में आँखों की पुतलियों की नीलिमा से नीला-नीला-यह कंदुक एक होने पर भी तीन जैसा प्रतीत होता है। ततः कालिदास आह- 'पयोधराकारधरो हि कन्दुकः करेण रोषादभिहन्यते मुहुः । इतीव नेत्राकृतिभीतमुत्पलं स्त्रियः प्रसादाय पपात पादयो.' ॥ २६६ ॥ तब कालिदास ने कहा- क्योंकि इस कंदुक ने सुंदरी के पयोधरों का आकार-धारण किया, अतएव बार-बार यह उस सुंदरी के कर-द्वारा रोष के कारण ताडित किया जाता है। इसी से यह नयनों के आकार से डरे कमल के समान कर्ण भूषण सुंदरी को प्रसन्न करने के निमित्त पैरों पर गिर पड़ा है। तदा राजा तुष्टस्त्रयाणामक्षरलक्षं ददौ । विशेषेण च कालिदासम्- दृष्टावतंसकुसुमपतनयोद्धारं सम्मानितवान् । तब राजा ने संतुष्ट होकर तीनों को प्रत्यक्षर पर लाख-लाख मुद्राएँ दीं ।