भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ भोजप्रबन्धः कालिदास को अनदेखे आभूषण कर्णफूल के पतन का ज्ञाता होने के कारण विशेष रूप से संमानित किया । ( २६ ) अष्टषोधय अन्याः कथाः ततः कदाचिच्चित्रकर्मावलोकनतत्परो राजा चित्रलिखितं महाशेषं दृष्ट्वा 'सम्यगलिखितम्' इत्यवदत् । तदा कश्चिच्छिवशर्मा नाम कविः शेषमिषेण राजानं स्तौति- अनेके फणिनः सन्ति भेकभक्षणतत्पराः । एक एव हि शेषोऽयं धरणीधारणक्षमः ॥ ३०० ॥ तदानीं राजा तदभिप्रायं ज्ञात्वा तस्मै लक्षं ददौ । कभी चित्रकारी देखने में लगे राजा ने चित्र में बने महाशेष नाग को देख कर कहा कि अच्छा चित्र बना है । तो कवि शिवशर्मा नामक कवि ने शेष- नाग के व्याज से राजा की स्तुति की-- मेढकों को खाने में लगे बहुत-से हैं धरती पर साँप । किंतु धरणी-धारणा में शक्त एक ही शेषनाग फणिराज । (मेंढकों को खाने में लगे रहने वाले तो अनेक सर्प हैं, परंतु धरती को धारने में समर्थ एक यह शेष नाग ही है । ) तब उसका अभिप्राय जान कर उस समय राजा ने उसे एक लाख मुद्राएँ दीं । कदाचिद्धेमन्तकाले समागते ज्वलन्तीं (१) हसन्तीं संसेवयन् राजा कालिदासं प्राह-'सुकवे, हसन्तीं वर्णय' इति । ततः सुकविराह-- 'कविमतिरिव बहुलोहा संघटितचक्रा प्रभातवेलेव । हरमूर्तिरिव हसन्ती भाति विधूसानलोपेता' ॥ ३०१ ॥ राजाक्षरलक्षं ददौ । कभी हेमंत ऋतु के आ जाने पर जलती अँगीठी पर तापते हुए राजा ने कालिदास से कहा-'हे सुकवि, अँगीठी का वर्णन करो।' तब सुकवि ने कहा- यह हंसती जैसे कवि की बुद्धि बहुलोहा (बहुल+ऊहा=अनेक प्रकार की कल्पना करने वाली ) होती है, वैसे ही बहुलोहा (बहुत सा लोहा है