भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः १५७ जिसमें) है; जैसे प्रभात काल सुघटित चक्र अर्थात् चकई-चकवा का संघटन (मिलाप) करने वाला होता है, वैसे ही सुघटितचक्रा अर्थात् भली चक्राकार (गोल) बनी है; और जिस प्रकार शिवजी की मूर्ति विधूमानल (विधु+ उमा+अनल) अर्थात् चंद्रमा, पार्वती और तृतीय नेत्र की ज्वाला से युक्त है उसी प्रकार विधूमानल अर्थात् धूमरहित अग्नि से सुशोभित है । राजा ने अक्षर-अक्षर पर लाख-लाख मुद्राएँ दीं । एकदा भोजराजोऽन्तगृहे भोगाईस्तुल्यगुणाश्चतस्रो निजाङ्गना अप- श्यत्। तासु च कुन्तलेश्वरपुत्र्यां पद्मावत्यामृतुस्नानम्, अङ्गराजस्य पुत्र्यां चन्द्रमुख्यां क्रमप्राप्तिम्, कमलानाम्न्यां च द्यूतपणजयलब्धप्राप्तिम्, अग्र- महिष्यां च लीलादेव्यां दूतीप्रेषणमुखेनाह्वानं च, एवं चतुरो गुणान्दृष्ट्वा तेषु गुणेषु न्यूनाधिकभावं राजाप्यचिन्तयत् । तत्र सर्वत्र दाक्षिण्यनिधी राज-राजः श्रीभोजस्तुल्यभावेन द्वित्रिघटिकापर्यन्तं विचिन्त्य विशेषानाव- धारणेन निद्रां गतः । प्रातश्चोत्थाय कृताह्निकः सभामगात् । एक बार भोजराज ने अंतः पुर में संमोग योग्य, समान गुणों वाली अपनी चार पत्नियों को देखा । उनमें कुंतलाधिपति की पुत्री पद्मावती मासिक ऋतु-स्नानकर चुकी थी, अंगराज की बेटी चंद्रमुखी की नियत पारी थी, कमला नाम की रानी ने जुए की बाजी में राजा को जीतकर उपलब्ध किया था । और पट्टरानी लीलादेवी ने दूती भेजकर स्वयं उन्हें आमंत्रित किया था । इस प्रकार इन चारों योग्यता के आधारों को देखकर उन गुणा धारों में कौन छोटा है, कौन बड़ा-यह राजा विचार करने लगा । सब में दक्षिणता रखनेवाला 'दक्षिणनायक' (तुल्यानुरागी) राजराजेश्वर श्री भोज समान भाव से दो-तीन घड़ी तक विचार करके भी किसी विशिष्टता की अवधारणा न करने के कारण सो गया । और सुबह उठकर दैनिक कार्य करके सभा में पहुँचा । तत्र च सिंहासनमलङ्कुर्वाणः श्रीभोजः सकलविद्वत्कविमण्डलमण्डनं कालिदासमालोक्य 'सुकवे, इमां त्र्यक्षरोनतुरीयचरणां समस्यां शृणु।' इत्युक्त्वा पठति-'अप्रतिपत्तिमूढमनसा द्वित्राः स्थिता नाडिकाः।' इति पठित्वा राजा कालिदासमाह-'सुकवे, एतत्समस्यापूरणं कुरु' इति ।