भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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१५८ भोजप्रबन्धः वहाँ सिंहासन को सुशोभित करते श्री भोज ने समस्त विद्वानों और कवियों की मंडली के श्रृंगार कालिदास को देखकर कहा—'सुकवे, तीन अक्षर कम चतुर्थ चरण वाली इस 'समस्या' को सुनो' और पढ़ा—'किकर्तव्य विमूढ़ विता दीं, घड़ियां दो-तीन।' यह पढ़कर राजा ने कालिदास से कहा—'हे सुकवि, इस समस्या की पूर्ति करो।' ततः कालिदासस्तस्य हृदयं करतलामलकवत्पश्यंस्त्रयक्षराधिक- चरणत्रयविशिष्टां तां समस्यां पठति--देव, स्नाता तिष्ठति कुन्तलेश्वरसुता वारोऽङ्गराजस्वसु- र्द्यूते रात्रिरियं जिता कमलया देवी प्रसाद्याधुना । इत्यन्तःपुरसुन्दरीजनगुणे न्यायाधिकं ध्यायता देवेनाप्रतिपत्तिमूढमनसा द्वित्राः स्थिता नाडिकाः॥ ३०२॥ तदा राजा स्वहृदयमेव ज्ञातवतः कालिदासस्य पादयोः पतति स्म । कविमण्डलं च चमत्कृतमजायत । तब राजा के हृदय को हथेली पर रखे आँवले के सदृश-देखते कालिदास ने शेष तीन चरण और (चतुर्थ चरण के शेष) तीन अक्षरों से विशिष्ट उस समस्या को पढ़ा— कुंतलराजसुता ऋतुस्नाता, अंगराजदुहिता का वार; कमला जीती रात द्यूत में, 'देवी' की करनी मनुहार; अंतःपुर की सुंदरियों के गुण-परिवीक्षण में हो लीन— किं कर्तव्य विमूढ़ विता दीं राजा ने घड़ियाँ दो-तीन । तब राजा अपने मन को ही जान लेने वाले कालिदास के पैरों पड़ा और कवि मंडली चमत्कृत हो गयी । एकदा राजा धारानगरे विचरन्क्वचित्पूर्णकुम्भं धृत्वा समायान्तीं पूर्णचन्द्राननां कञ्चिद्दृष्ट्वा तत्कुम्भजले शब्दं च कञ्चन श्रुत्वा 'नूनमेव तस्याः कण्ठग्रहेऽयं घटो रतिकूजितमिव कूजित' इति मन्यमानः सभायां कालिदासं प्राह--'कूजितं रतिकूजितम्' इति ।

  • एक बार धारा नगर में विचरण करते राजा भोज ने किसी स्थान पर भरे घड़े को लेकर आती एक पूर्ण चंद्रमा के समान मुखवाली स्त्री को देखा