भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर उस घड़े में जल में उत्पन्न होती ध्वनि को सुनकर यह मान लिया कि सुंदरी के द्वारा पकड़ कर लिये जाते (इस प्रकार आलिंगित) इस घटकी ध्वनि रति-समय सुंदरी के द्वारा किये जाते कूजन शब्द के समान है और सभा में जाकर कालिदास ने कहा—'कूजित रति कूजित है।' कविराह— 'विदग्धे सुमुखे रक्ते नितम्बोपरि संस्थिते । कामिन्याश्लिष्टसुगले कूजितं रतिकूजितम्' ॥ ३०३ ॥ तदा तुष्टो राजा प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ; ननाम च । कवि ने कहा—खूब पके, सुंदर मुँहवाले, लाल, कमर पर रखे हुए; गले लगे कामिनि के घट का यह कूजित रति कूजित है ॥ तब संतुष्ट होकर राजा ने प्रत्यक्षर लक्ष मुद्राएँ दीं और प्रणाम किया । एकदा नर्मदायां महाह्रदे जालकैर्वकः शिलाखण्ड ईदृङ्गं शिष्टाचारः कश्चिद्दृष्टः । तैश्च परिचिन्तितम्—'इदमत्र लिखितमिव किञ्चिद्भाति । नूनमिदं राजनिलटं नेयम्' इति बुद्ध्या भोजसंसि समानीतम् । एक बार नर्मदा की गहरी जलराशि में जाल डालने वाले मछेरों ने घिसे-मिटे अक्षरों वाला एक शिला का खंड देखा । उन्होंने सोचा—'यह इस पर कुछ लिखा-सा प्रतीत होता है । निश्चय ही इसे राजा के पास ले जाना उचित है ।' ऐसा निश्चय करके वह शिलाखंड भोज की सभा में ले आये । तदाकर्ण्य भोजः प्राह—'पूर्वं भगवता हनुमता श्रीमद्रामायणं कृतम् । तदत्र ह्रदे प्रक्षेपितमिति श्रुतमस्ति । ततः किमिदं लिखितमित्यवश्यं विचार्यमिति लिपिज्ञानं कार्यम् ।' मछेरों की बात सुनकर भोज ने कहा—'प्राचीन काल में भगवान् हनुमान ने श्रीमद् रामायण की रचना की थी । ऐसा सुना गया है कि उसे उन्होंने यहीं जल राशि में फेंक दिया था । सो यह क्या लिखा है, इस पर अवश्य विचार होना चाहिए और एतदर्थ इसकी लिपि की जानकारी करानी चाहिए ।'