भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० भोजप्रबन्धः जतुपरीक्षयाक्षराणि परिज्ञाय पठति । तत्र चरणद्वयमानुपूर्व्याल्लब्धम्- ‘अयि खलु विषमः पुराकृतानां भवति हि जन्तुषु कर्मणां विपाकः' ततोः भोजः प्राह-‘एतस्य पूर्वार्धं कथ्यताम्' इति । चपड़े (लाख) की विधि द्वारा परीक्षा करके अक्षरों के ज्ञात होने पर पढ़ा उसमें दो चरण अनुक्रम से मिले— मिलता है कैसा दारुण फल प्राणियों को, पहिले कभी किये गये हाय, कर्मजाल का ! तब भोज ने कहा—'इसका पूर्वार्ध कहें।' तदा भवभूतिराह-- क्व नु कुलमकलङ्कमायताक्ष्याः । क्व नु रजनीचरसङ्गमापवादः । अयि खलु विषमः पुराकृतानां भवति हि जन्तुषु कर्मणां विपाकः' ॥ ३०४ ॥ तब भवभूति ने कहा--- कहाँ तो निष्कलंक कुल विशाल नयना का, कहाँ मिला अपवाद निशाचर के संग का; मिलता है कैसा दारुण फल प्राणियों को, पहिले कभी किये गये, हाय, कर्मजाल का ! ततो भोजस्तत्र ध्वनिदोषं मन्वानस्तदेव पूर्वार्धमन्यथा पठति स्म-- ‘क्व जनकतनया क्व रामजाया क्व च दशकन्धरमन्दिरे निवासः । अयि खलु विषमः पुराकृतानां भवति हि जन्तुषु कर्मणां विपाकः' ॥ तो भोज ने उसमें ध्वनि दोष मान कर उस पूर्वार्ध को दूसरे प्रकार से पढ़ा— कहाँ जनक तनया और राम की पत्नी कहाँ, और कहाँ रहना दशकंधर के महल का ! मिलता है कैसा दारुण फल प्राणियों को, पहिले कभी किये गये हाय, कर्मजाल का ! ततो भोजः कालिदासं प्राह--'सुकवे, त्वमपि कविहृदयं पठ' इति । स प्राह--