भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ भोजप्रबन्धः उस प्रकार वहीं जमे रहने पर राजा चिंता करने लगा कि इससे कैसे छुटकारा मिले ? तदा कालिदासः प्राह—'देव, नूनमयं राक्षसः सकलशास्त्रप्रवीणः सुकविश्व भाति । अतस्तमेव तोषयित्वा कार्यं साधयानि । मान्त्रि- कास्तिष्ठन्तु । मम मन्त्रं पश्य' इत्युक्त्वा स्वयं तत्र रात्रौ गत्वा शेते स्म । तो कालिदास ने कहा—'महाराज, यह राक्षस निश्चय ही संपूर्ण शास्त्रों का विज्ञाता और सुकवि प्रतीत होता है। इसलिए उसको प्रसन्न करके ही कार्य सिद्ध करूँगा । मंत्रवेत्ता ठहरें, आप मेरा मंत्र देखिए।' ऐसा कह रात में वहाँ जाकर स्वयं सो गया । प्रथमयामे ब्रह्मराक्षसः समागतः स चापूर्वं पुरुषं दृष्ट्वा प्रतियास- मेकैकां समस्यां पाणिनिसूत्रमेव पठति । येनोत्तरं तद्धृदयगतं नोक्तम्, 'अयं न ब्राह्मणः, अतो हन्तव्यः' इति निश्चित्य हन्ति । तदानीमपि पूर्ववदयमपूर्वः पुरुषः । अतो मया समस्या पठनीया । न चेद्वक्ति सदृशमुत्तरं तस्यास्तदा हन्तव्य इति । बुद्ध्या पठति— 'सर्वस्य द्वे' इति । पहिले पहर में ब्रह्म राक्षस आया करता था और नये पुरुष को देखकर प्रत्येक पहर में एक-एक समस्या के रूप में पाणिनि का सूत्र ही पढ़ा करता था । जो उसका मनचीता उत्तर न देता, यह विचार कर कि 'यह ब्राह्मण नहीं है, इसे मार डालना चाहिए,' उसे मार डालता । 'नया पुरुष आया है, इसलिए मुझे समस्या पढ़नी चाहिए। यदि ठीक उत्तर न दे तो मार डालना चाहिए'—कालिदास के वहाँ होने पर भी यही विचार कर उसने पढ़ा— 'सब के दो'— तदा कालिदासः प्राह— 'सुमतिकुमती सम्पदापत्तिहेतू' इति । ततः स गतः । तो कालिदास ने कहा— 'कारण संपद्-विपद् की सुमति-कुमति ही सदा हुआ करती हैं।' तो वह चला गया ।