भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 166, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] भोजप्रबन्धः १६३ पुनरपि द्वितीयामे समागत्य पठति— 'वृद्धो यूना' इति । फिर दूसरे पहर में आकर उसने पढ़ा— 'बूढ़े को युवक'— दिं कविराह— 'सहपरिचायात्त्यज्यते कामिनीभिः। इति । तो कवि ने कहा— 'ने परिचय हो जाने पर कामिनियाँ सदा छोड़ दिया करती हैं।' तृतीयामे स राक्षसः पुनः समागत्य पठति— 'एको गोत्रे' इति । तीसरे पहर में उस राक्षस ने फिर आकर पढ़ा— 'एक ही गोत्र में'-- ततः कविराह— 'प्रभवति पुमान्यः कुटुम्बं बिभर्ति' इति । तो कवि ने कहा-- 'पुरुष ऐसा होता है, जिससे कुटुंब का पालन हुआ करता है।' ततश्चतुर्थयामे आगत्य स राक्षसः पठति— 'स्त्री पुंवच्च' इति । तत्पश्चात् चौथे पहर में आकर उस राक्षस ने पढ़ा-- 'स्त्री पुरुषतुल्य'-- ततः कविराह-- 'प्रभवति यदा तद्धि गेहं विनष्टम्' ॥ ३०७ ॥ इति । तो कवि ने कहा-- 'जिस घर में हो जाती, वह घर विनाश को प्राप्त हुआ करता है।' ततः स राक्षसो यामचतुष्टयेऽपि स्वाभिप्रायमेव ज्ञात्वा तुष्टः प्रभात- समय समागत्य तमाश्लिष्य प्राह—'सुमते, तुष्टोऽस्मि । किं तवाभीष्टम्' इति । कालिदासः प्राह—'भगवन्, एतद्गृहं विहायान्यत्र गन्तव्यम्' इति । सोऽपि तथा' इति गतः। अनन्तरं तुष्टो भोजः कविं बहु मानितवान् ।