भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 167

१६४ भोजप्रबन्धः तो वह राक्षस चारों ही पहरों में अपना मनचीता भाव जानकर संतुष्ट हुआ और प्रभात काल में आकर कालिदास का आलिंगन करके.बोला--'हे सुबुद्धि शाली, मैं संतुष्ट हूँ। तुम्हारा अभीष्ट क्या है ?' कालिदास ने कहा— 'भगवन्, इस घर को छोड़कर और स्थान पर चले जाइए।' वह भी 'ठीक' है, यह कह चला गया। इसके बाद संतुष्ट भोज ने कवि का बहुत संमान किया। ---:०:--- ( २८ ) मल्लिनाथस्य दारिद्र्यनिवारणम् एकदा सिंहासनमलङ्कुर्वाणे श्रीभोजे सकलभूपालशिरोमणौ द्वार- पाल आगत्य प्राह—'देव, दक्षिणदेशात्कोऽपि मल्लिनाथनामा कविः कौपीनावशेषो द्वारि वर्तते। राजा—'प्रवेशय' इत्याह। एक बार समस्त पृथ्वी-पतियों के शिर की मणि के समान ( श्रेष्ठ ) श्री भोज के सिंहासन को सुशोभित करने पर द्वारपाल आकर बोला—'महाराज, दक्षिण देश से आया कोई कौपीन मात्र धारी मल्लिनाथ नामक कवि द्वार पर उपस्थित है।' राजा ने कहा—'प्रवेश दो।' ततः कविरागत्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा तदाज्ञया चोपविष्टः पठति -- 'नागो भाति मदेन खं जलधरैः पूर्णेन्दुना शर्वरी शीलेन प्रमदा जवेन तुरगा नित्योत्सवैर्मन्दिरम्। वाणी व्याकरणेन हंसमिथुनैर्नद्यः सभा पण्डितैः सत्पुत्रेण कुलं त्वया वसुमती लोकत्रयं भानुना' ॥३०८॥ तब कवि ने आकर 'कल्याण हो' कहा और राजा की आज्ञा से बैठ कर पढ़ा-- मद से हाथी शोभित होता है, आकाश जलधर बादलों से, रात्रि पूर्ण चंद्र से, नारी शील से, घोड़ा वेग से, मंदिर प्रतिदिन के उत्सवों से, वाणी व्याकरण से, नदियाँ हंसों के जोड़ों से, सभा पंडितों से, कुल सपूत से, धरती आपसे और तीनों लोक सूर्य से शोभित होते हैं। ततो राजा प्राह--'विद्वन्, तवोद्देश्यं किम्' इति। तब राजा ने कहा--'हे विद्वान्, तुम्हारा उद्देश्य क्या है?',