भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः १६५ ततः कविराह-- 'अम्बा कुप्यति न मया न स्नुषया सापि नाम्बया न मया । अहमपि न तया न तया वद राजन्कस्य दोषोऽयम्' ॥३०६॥ इति । राजा च दारिद्रयदोषं ज्ञात्वा कविं पूर्णमनोरथं चक्रे । तब कवि ने कहा-- माँ क्रोध करती है, पर न मुझ पर न अपनी पतोहू ( मेरी पत्नी ) पर; और वह ( मेरी पत्नी ) भी न माँ पर क्रोध करती है, न मुझ पर; और मैं न माँ पर क्रोध करता हूँ, न पत्नी पर; तो हे राजा, आप ही कहो कि यह दोष किसका है ? और राजा ने दरिद्रता का दोष समझा और कवि का मनोरथ पूर्ण कर दिया । ---: ० :--- ( २६ ) राज्ञः सर्वस्वदानम् एकदा द्वारपाल आगत्य राजानं प्राह--'देव, कविशेखरो नाम महाकविर्द्वारि वर्तते । राजा--'प्रवेशय' इत्याह । एक बार द्वारपाल आकर राजा से बोला--'महाराज, कवि शेखर नाम का महाकवि द्वार पर उपस्थित है ।' राजा ने कहा--प्रविष्ट कराओ ।' ततः कविरागत्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा पठति-- 'राजन्दौवारिकादेव प्राप्तवानस्मि वारणम् । मदवारणमिच्छामि त्वत्तोऽहं जगतीपते' ॥ ३५० ॥ तब कवि ने आकर स्वस्ति' कहा और पढ़ा-- हे राजा, वारण ( बाधा ) मुझे द्वारपाल से ही प्राप्त हो चुका है; हे जगत् के स्वामी, मैं तुम से मद युक्त वारण ( हाथी ) चाहता हूँ । तदा प्राङ्मुखस्तिष्ठन्नराजाऽतिसन्तुष्टस्तं प्राग्देशं सर्वं कवये दत्तं मत्वा दक्षिणाभिमुखोऽभूत् । ततः कविश्चिन्तयति--'किमिदम् । राजा मुखं परावृत्य मां न पश्यति' इति ।