भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ भोजप्रबन्धः उस समय पूर्व की ओर (कवि की ओर) मुख करके बैठे राजा ने अत्यंत संतुष्ट हो 'पूर्व का संपूर्ण देश मैंने कवि को दे दिया'—यह मान लिया और दक्षिण की ओर मुंह करके बैठ गया। तो कवि ने सोचा—'यह क्या है कि राजा मुँह फेर कर बैठ गया और मेरी ओर देखता भी नहीं?' ततो दक्षिणदेशे समागत्याभिमुखः कविः पठति-- 'अपूर्वेयं धनुर्विद्या भवता शिक्षिता कथम्। मार्गणौघः समायाति गुणो याति दिगन्तरम् ॥ ३११ ॥ ततो राजा दक्षिणदेशमपि मनसा कवये दत्त्वा स्वयं प्रत्यङ्मुखोऽभूत्। तब दक्षिण की ओर आ राजा के संमुख हो कवि ने पढ़ा--आपने यह अनोखी धनुर्विद्या कहाँ से सीखी है कि वाण-समूह तो आता है पर प्रत्यंचा (धनुष की डोरी) दूसरी ओर चली जाती है, अर्थात् मार्गणौघ (याचक समूह) के आते ही गुण (कृपा) दूसरी ओर हो जाती है। तो दक्षिण देश भी कवि को देने का मन में संकल्प कर राजा स्वयम् पश्चिम को मुख करके बैठ गया। कविस्तत्रागत्य प्राह-- 'सर्वज्ञ इति लोकोऽयं भवन्तं भाषते मृषा। पदमेकं न जानीषे वक्तुं नास्तीति याचके' ॥ ३१२ ॥ ततो राजा तमपि देशं कवेर्दत्तं मत्वोदङ्मुखोऽभूत्। कवि उधर आकर बोला-- आपको यह संसार व्यर्थ ही सर्वज्ञ कहता है; आप तो याचक से 'नहीं है' यह एक शब्द भी कहना नहीं जानते। तो राजा ने वह (पश्चिम) देश भी कवि को देकर उत्तर की ओर मुख कर लिया। कविस्तत्राप्यागत्य प्राह-- 'सर्वदा सर्वदोऽसीति मिथ्या त्वं कथ्यसे बुधैः। नारयो लेभिरे पृष्ठं न वक्षः परयोषितः' ॥ ३१३ ॥ ततो राजा स्वां भूमिं कविदत्तां मत्वोत्तिष्ठति स्म।